Posts

एस पी सिंह अगर आज होते तो क्या कर रहे होते?

  जयंत सिंह तोमर- पत्रकार सुरेन्द्र प्रताप सिंह यानी एस पी सिंह को आज याद करने का दिन है। लोग उनके ‘रविवार’ के दिनों को याद करते हैं और ‘आज तक’ के समय को। कभी कभी ‘नवभारत टाइम्स’ के समय को। अगर ‘आज तक’ में वे न आये होते तो क्या हुआ होता? १९८६ से लेकर १९९५ का समय हिन्दी पत्रकारिता के तमाम संक्रमण कालों में से एक है।‌ जिस ‘दिनमान’ में सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’, रघुवीर सहाय, सर्वेश्वरदयाल दयाल सक्सेना जैसे विचारवान लोग रहे उसी में घनश्याम पंकज को सम्पादक की बागडोर सौंपी गई। यह वही समय है जब ‘बैनेट एंड कोलमैन’ समूह के कर्ताधर्ताओं का आप्तवाक्य चर्चाओं में आता है ‘हम अखबार विज्ञापन के लिए निकालते हैं’। यह लगभग ऐसा समय है जब साहस एक तरफ़ खड़ा है और संतुलन दूसरी तरफ़। पटना में ‘जनसत्ता’ के लिए लिख रहे पत्रकार सुरेन्द्र किशोर से ‘सपनों में बनता देश’ लिखते हुए नवभारत टाइम्स के सम्पादक राजेन्द्र माथुर ने कहा था- हमारा अखबार अभियानी नहीं है। राजेन्द्र माथुर जी जिन पत्रकारों और समाचार संस्थानों को अभियानी मानते थे उन्होंने भी भले कुछ उच्छृंखल पत्रकार दिए हों, लेकिन उनके पास साहस...

पत्रकार गढ़ते थे एसपी सिंह

  आज पत्रकारिता के मायने बदल गए हैं, बदल रहे हैं अथवा बदल दिए गए हैं, नतीजतन, उन पत्रकारों के सामने भटकाव जैसी स्थिति आ गई है, जो पत्रकारिता को मनसा-वाचा-कर्मणा अपना धर्म-कर्तव्य और कमज़ोर-बेसहारा लोगों की आवाज़ उठाने का माध्यम मानकर इस क्षेत्र में आए और हमेशा मानते रहे. और, वे नवांकुर तो और भी ज़्यादा असमंजस में हैं, जो पत्रकारिता की दुनिया में सोचकर कुछ आए थे और देख कुछ और रहे हैं. ऐसे में, 2005 में प्रकाशित संतोष भारतीय की पुस्तक-पत्रकारिता: नया दौर, नए प्रतिमान हमारा मार्गदर्शन करती और बताती है कि हमारे समक्ष क्या चुनौतियां हैं और हमें उनका सामना किस तरह करना चाहिए. चार दशक से भी ज़्यादा समय हिंदी पत्रकारिता को समर्पित करने वाले संतोष भारतीय देश के उन पत्रकारों में शुमार किए जाते हैं, जो देश और समाज से जुड़े प्रत्येक मुद्दे पर निर्भीक, सटीक, निष्पक्ष टिप्पणी करते हैं. पुस्तक-पत्रकारिता: नया दौर, नए प्रतिमान में रविवार से लेकर चौथी दुनिया तक की यात्रा के उनके विभिन्न अनुभव एवं रिपोर्ट्स संकलित हैं, जिनका प्रकाशन हम शृंखलाबद्ध तरीके से प्रारंभ कर रहे हैं. उम्मीद है, सुधी पाठकों और पत्...

सुरेंद्र प्रताप सिंह की बरसी और आर. अनुराधा की याद

  Dilip C Mandal : कैंसर के साथ जीते हुए अनुराधा ने यह मुश्किल काम भी किया. अनुराधा की रचना प्रक्रिया और कार्य शैली को जानें.  शिक्षक, पत्रकार और लेखक सुरेंद्र प्रताप सिंह की कल बरसी है. 1948 में जन्मे एसपी सिंह का, जीवन के 50 साल पूरे करने से पहले ही, आकस्मिक बीमारी की वजह से 27 जून 1997 को निधन हो गया. पत्रकारिता के नए छात्र उन्हें आज तक के संस्थापक के रूप में जानते हैं. रविवार पत्रिका की शुरुआत से लेकर धर्मयुग, नवभारत टाइम्स, इंडिया टुडे और बीबीसी से वे जुड़े रहे. मॉडर्निटी, धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और स्त्री अधिकारों के प्रति असंदिग्ध प्रतिबद्धता उन्हें भीड़ से अलग पहचान देती है. Dilip C Mandal : कैंसर के साथ जीते हुए अनुराधा ने यह मुश्किल काम भी किया. अनुराधा की रचना प्रक्रिया और कार्य शैली को जानें.  शिक्षक, पत्रकार और लेखक सुरेंद्र प्रताप सिंह की कल बरसी है. 1948 में जन्मे एसपी सिंह का, जीवन के 50 साल पूरे करने से पहले ही, आकस्मिक बीमारी की वजह से 27 जून 1997 को निधन हो गया. पत्रकारिता के नए छात्र उन्हें आज तक के संस्थापक के रूप में जानते हैं. रविवार...

एसपी सिंह की पुण्यतिथि पर आज राजेश प्रियदर्शी ने उन्हें यूं किया याद

राजेश प्रियदर्शी आज मुझ जैसे अनेक पत्रकारों के mentor या दोस्ताना उस्ताद एसपी की 23वीं पुण्यतिथि है. उनसे न जाने कितना कुछ सीखा, खबरों को देखने-समझने का सलीका, लगातार खोज-बीन-सवाल करते रहने की आदत और ताकतवर लोगों की नाराज़गी की परवाह न करने की हिम्मत….इन बातों की अहमियत करियर के शुरुआती सालों में उन्हें काम करते देखकर समझ में आई. IIMC में दाखिले के इंटरव्यू के दौरान 1992 में उनसे पहली बार मिला, उन्होंने इंटरव्यू के बाद, पेंसिल से लिखकर अपना फ़ोन नंबर दिया, तब मोबाइल नहीं होते थे. जब घर से लाए पैसे खत्म हो गए तो उन्हें फोन करने का फ़ैसला किया, उनके अलावा और किसी को जानता भी नहीं था, उन्होंने खुद ही कहा था कि फ़ोन करना. एक रुपए का सिक्का डालकर बूथ से फ़ोन करने पर उन्होंने शाम को मिलने के लिए बंगाली मार्केट के 14 बाबर रोड बुलाया. यह कपिल देव का बंगला था जहाँ से उनकी स्पोर्ट्स फ़ीचर की एजेंसी चलती थी, नवभारत टाइम्स के कार्यकारी संपादक के पद से इस्तीफ़ा देने के बाद एसपी शाम को देव फ़ीचर्स के दफ्तर में थोड़ी देर के लिए बैठते थे. मैं दिल्ली के रास्त्तों से अनजान गलत बस स्टॉप पर उतरा, अगस्त का...

49 की उम्र में TV न्यूज़ को खुदा बनाने वाले एसपी सिंह को कौन-कौन जानता है?

  हरीश पाठक- महानायक की याद…27 साल पहले, आज के ही दिन हिंदी पत्रकारिता के महानायक सुरेंद्र प्रताप सिंह (एस पी सिंह) ने अलविदा कह कर सभी को भौचक कर दिया था। तब उनकी उम्र सिर्फ 49 साल थी। वे वाया हिंदी पत्रकारिता, टीवी की दुनिया में आये थे। ‘आज तक’ की डीडी न्यूज़ पर आने वाली 20 मिनिट की न्यूज़ बुलेटिन को उन्होंने विशालकाय बना दिया। उसका स्लोगन ‘यह थीं खबरें आज तक, इंतजार कीजिए कल तक ‘घर घर तक पहुँच गया था। वे दोनों क्षेत्रों में शिखर पर थे क्योंकि वे एस पी सिंह थे। उनके तेवर, कलेवर, सोच, समझ, इरादे, इशारे, रिश्ते, पहुँच, निडरता, निर्भीकता, साफगोई ने उन्हें हिंदी पत्रकारिता का महानायक बना दिया।वे भरी सभा मे कह देते थे,’साहित्य का काम साहित्य करे,पत्रकारिता का काम उसे करने दे। पत्रकारिता दो टूक लहजे में की जाती है। यह साहित्य के वश में नहीं है। वह कुलीन बना रहे। हम आम जन की बात कहेंगे, करेंगे।’ यही सच था। ‘रविवार’ के जरिये एस पी सिंह ने जो तेवर की पत्रकारिता की उसने फूल, पत्ती, नदी, तालाब जैसे आवरण छापने वाली पत्रिकाओं को कोने में धकेल दिया ।वे खोजी पत्रकारिता और खोजी पत्रकारों के स्वर्ण...

रामनाथ गोयनका, एसपी सिंह और निधि कुलपति : बिना मरे स्वर्ग मिलना

  संजय सिन्हा- मैं  ट्रेन से पटना से दिल्ली लौट रहा था। एसी टू टायर के कोच में था। किसी स्टेशन पर अख़बारवाला आया। पहली ही खबर पर नज़र गई- “एसपी सिंह नहीं रहे।“ एसपी सिंह यानी सुरेंद्र प्रताप सिंह। “देखते रहिए आज तक, इंतज़ार कीजिए कल तक।” ‘आज तक’ अपने आरंभिक दिनों में ही एसपी सिंह का चेहरा बन गया था। मैं उन दिनों ‘जनसत्ता’ में था। रात के बुलेटिन में जब एसपी सिंह आते थे, तो वह एक बेहद साधारण चेहरा (बिलकुल भी चमकदार नहीं), मगर बोलता चेहरा होता था और लोग उन पर यक़ीन करते थे। पत्रकार होने के नाते, एसपी सिंह से मेरी दो-एक बार मुलाकात हो चुकी थी। मुझे वो आकर्षक नहीं लगे थे। तब प्रभाष जोशी और बनवारी का कद मुझे अधिक प्रेरक लगता था। मैंने भारत में टीवी पत्रकारिता को उठते और गिरते देखा है। जब कभी उस पर कुछ व्यक्तिगत संस्मरण लिखूंगा, तब लिखूंगा। अभी मैं एसपी सिंह को सिर्फ इसलिए याद कर रहा हूं, क्योंकि चलती ट्रेन में, जब मैंने उनके निधन की खबर पढ़ी (उन्हें ब्रेन हैमरेज हुआ था, यह खबर पहले से थी) तो मन बहुत विचलित हुआ। इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि बहुत कम समय में एसपी सिंह ने ‘आज तक’...

सियासतवे भी क्या दिन थे; जब एसपी सिंह ने दलित युवक की स्टोरी के लिए पीएम के जन्मदिन की खबर गिरा दी थी!

  कल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जन्मदिन था। इस उपलक्ष्य में कुछ ऐसा मायाजाल रचा गया मानो गणेश विसर्जन की धूम मची हो। टीवी, अख़बार, सोशल मीडिया सब के सब जन्मदिन के विज्ञापनों से पटे पड़े थे। लेकिन इस बीच पुराने वक्त की पत्रकारिता भी याद करनी जरूरी है। नीचे पढ़ें… शीतल पी सिंह- Subrat Kumar Sahu, ने इसे कल अपनी वाल पर लिखा था । मेरी मित्रसूची में नहीं हैं लेकिन फ़ेसबुक ने मुझे सुबह सुबह दिखाया । एक दिन पुरानी पोस्ट है लेकिन मुझे लगता है कि बेहद महत्वपूर्ण है ।मूल पोस्ट अंग्रेज़ी में है लेकिन उसका टूटा फूटा अनुवाद प्रस्तुत है! सुब्रत कुमार साहू- “मीडिया और सभी प्रधानमंत्रियों के जन्मदिन मुझे लगता है कि यह 1997 के अंत में था। मैं उस समय टीवी टुडे के साथ आजतक के लिए काम कर रहा था, जो डीडी2 पर एक दैनिक समाचार बुलेटिन था (बाद में यह एक समाचार चैनल बन गया)। वह प्रधानमंत्री आईके गुजराल का जन्मदिन था। उस शाम की लीड स्टोरी यही होनी थी। एक बार सभी कहानियां संपादित हो गईं और तैयार हो गईं, हम एंकर के लिए स्टूडियो सेट कर रहे थे। मुख्य संपादक सुरेंद्र प्रताप सिंह ही एंकर भी थे, जो उस समय एक स्टा...