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चेलों ने एसपी को बढ़ा-चढ़ा कर पेश कियाः विष्णु नागर

इंटरव्यू – विष्णु नागर (वरिष्ठ पत्रकार – साहित्यकार) : भाग दो : एसपी सिंह को बहुत ज्यादा हाइप दिया गया : कुछ लोग संगठित ढंग से रघुवीर सहाय के महत्‍व को कम आंक कर एसपी की इमेज को बढ़ा-चढ़ा कर पेश करते रहे :  एसपी की शिष्‍य मंडली बहुत बड़ी थी, जो रघुवीर सहाय ने क्रियेट नहीं की : ‘रविवार’ ने ओरिजनल पत्रकारिता नहीं की, ‘दिनमान’ और ‘धर्मयुग’ का मिश्रण था ‘रविवार’ : धर्मवीर भारती का आतंक हुआ करता था, लेकिन एसपी उनसे नहीं डरते थे : रघुवीर सहाय में उनके अपने बहुत आग्रह भी थे : विद्यानिवास मिश्र और अजय उपाध्याय का कार्यकाल मेरे लिए अच्छा नहीं रहा : विद्यानिवास जी ने हम जैसे कई लोगों को बिल्‍कुल किनारे लगा दिया : अजय उपाध्याय उलझे-उलझे आदमी लगे, उनके अंदर सुलझापन नहीं था : मुझे बड़ा पत्रकार माने या ना मानें, लेकिन लेखक ना मानें तो बुरा लगेगा : मुझे बौद्धिक खुराक अंग्रेजी से मिलती है : बहुत गरीबी देखी थी, तो स्थिरता की इच्‍छा मन में हमेशा रही : इस दौर में जीने के लिए किसी न किसी लेवल पर क्रियेटिव होना पड़ेगा : विभूति नारायण राय जैसे समझदार आदमी को किसी के बारे में अभद्र टिप्‍पणी नहीं करनी चाह...

'Death makes no concession to success'

   'Death makes no concession to success' Last issue on this page I wrote that death rarely comes by appointment. It is a phrase that has come back to haunt me. S.P. Singh Last issue on this page I wrote that death rarely comes by appointment. It is a phrase that has come back to haunt me. For last week my colleague Surendra Pratap Singh, a man who many knew as the presenter of Aaj Tak, our daily Hindi news show on Doordarshan, passed away. Just 49, S.P., as he was known to all, was suddenly struck down by a brain haemorrhage. Here was a man in the very prime of his journalistic career, who had just mastered a new medium and was raring to go for bigger things. But it was not to be. Death makes no concession to success. S.P. actually came into television by accident. He was a highly respected Hindi journalist and I took him on board two years ago as editor of the Hindi edition of INDIA TODAY. But even before he could take on that post, our group received a proposal to do the Hi...

जयंती विशेष-पुस्तक अंशः सुरेंद्र प्रताप सिंह, खबरें आज तक जारी हैं

     जयंती विशेष-पुस्तक अंशः सुरेंद्र प्रताप सिंह, खबरें आज तक जारी हैं 'तो ये थीं खबरें आज तक, इंतजार कीजिए कल तक.' एसपी यानी सुरेंद्र प्रताप सिंह के कई  परिचयों में यह भी एक परिचय था. आज उनकी जयंती पर आर अनुराधा द्वारा संपादित 'पत्रकारिता का महानायक: सुरेंद्र प्रताप सिंह' संचयन का एक अंश  'तो ये थीं खबरें आज तक, इन्तजार कीजिए कल तक.' एसपी यानी सुरेंद्र प्रताप सिंह के कई परिचयों में यह भी एक परिचय था. 4 दिसंबर, 1948 को जन्में एसपी, पत्रकारिता में निर्भिकता और अपने उम्दा संपर्कों के लिए जाने जाते थे. वह अपने दौर में सबसे युवा उम्र में संपादक बनने वाले पत्रकारों में शुमार थे. प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े जिन लोगों ने उन्हें नहीं देखा, उनके लिए भी वह एक खासा जाना- पहचाना नाम हैं. उन पर छपी एक किताब दि रियल मीडियामैन में उनके साथ काम कर चुके एक पत्रकार-संपादक ने लिखा था, सुरेंद्र प्रताप सिंह और एम जे अकबर की जोड़ी ने पत्रकारिता के इतिहास में पहली बार नौजवानों की साख बढ़ाई. रविवार और संडे ने ही खोजी पत्रकारिता की नींव डाली. पहली बार हिंदी में लिखने वा...

जब TOI के हिंदी संस्करण पर एसपी सिंह ने यूँ पानी फेर दिया था!

  शकील अख्तर  जो काम समीर जैन नहीं कर पाए वह अब गोयनका के वंशज कर रहे हैं। इंडियन एक्सप्रेस हिंदी में। लल्लनटॉप वाले सौरभ द्विवेदी संभालेंगे। 1990 के शुरुआती दशक में समीर जैन टाइम्स आफ इंडिया (TOI) का हिंदी संस्करण निकालने की योजना बना रहे थे। मगर उस समय के नवभारत टाइम्स के कार्यकारी संपादक एसपी सिंह ने इसका विरोध किया। नवभारत टाइम्स छोड़ दिया। समीर जैन को अपना प्रोजेक्ट वापस लेना पड़ा। प्लान यह था की नवभारत टाइम्स मौलिक हिंदी अखबार के रूप में न छपकर टाइम्स आफ इंडिया के हिंदी अनुवाद के रूप में आएगा। एसपी एक हिंदी अखबार को अंग्रेजी का अनुवाद बनाने के लिए राजी नहीं थे। हिंदी अखबारों के बड़े संपादकों के रूप में कई लोगों के नाम लिए जाते हैं। मगर उसूल के लिए लड़ जाने वाले संपादक एसपी सिंह ही थे। खैर वह बात अलग है। कभी बड़ा इस पर लिखेंगे। फिलहाल यह देखना होगा की एक्सप्रेस हिन्दी निकलने के बाद जनसत्ता का क्या होगा? वैसे तो वह समाप्त प्रायः ही है। हिंदी पत्रकारिता में बहुत दिनों से कोई हलचल नहीं थी। ‌देखते हैं यह नया अखबार क्या करता है! https://www.bhadas4media.com/toi-ka-hindi-sanska...

शुरुआत में एसपी को टेलीविजन के लायक नहीं बताया जा रहा था, पर ये है उनकी 'असली कहानी'

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  शुरुआत में एसपी को टेलीविजन के लायक नहीं बताया जा रहा था, पर ये है उनकी 'असली कहानी' उन दिनों सारे हिन्दुस्तान में खुशी की लहर ने लोगों के दिलों को भिगोना शुरू कर दिया था... by  समाचार4मीडिया ब्यूरो Published  - Thursday, 27 June, 2024 Last Modified: Thursday, 27 June, 2024 Share राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।। हिन्दुस्तान में जो स्थान संगीत में केएल सहगल, मोहम्मद रफी या लता का है, क्रिकेट में सुनील गावस्कर या सचिन तेंदुलकर का है, हॉकी में मेजर ध्यानचंद का है, फिल्म अभिनय में दिलीप कुमार और अमिताभ बच्चन का है, वही स्थान हिंदी पत्रकारिता में राजेंद्र माथुर और हिंदी टीवी पत्रकारिता में एसपी का है। जब चैनल नहीं थे तो उस दौर में एसपी ने टीवी पत्रकारिता के जो कीर्तिमान या मानक तय किए, वे आज भी मिसाल हैं। इन्हीं महानायक एसपी की पुण्यतिथि सत्ताइस जून को है। मेरा उनके साथ करीब सत्रह साल तक करीबी संपर्क रहा। उन दिनों सारे हिन्दुस्तान में खुशी की लहर ने लोगों के दिलों को भिगोना शुरू कर दिया था। आजादी की आहट सुनाई देने लगी थी। ये तय हो गया था कि दो-चार महीने में अंग्रेज हिन्दुस...

पत्रकारिता: महानायक का विचार पक्ष

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  पत्रकारिता: महानायक का विचार पक्ष इसे हिंदी के बुद्धिजीवियों को पढऩा चाहिए पर आज के युवाओं को इसे सबसे ज्यादा पढऩे की जरूरत है, जिन्हें भविष्य का भारत गढऩा है. सुरेंद्र प्रताप सिंह प्रेम कुमार मणि अपडेटेड 10 फ़रवरी , 2013 पत्रकारिता का महानायक: सुरेंद्र प्रताप सिंह आर. अनुराधा राजकमल प्रकाशन, दरियागंज, नई दिल्ली-2, कीमत: 550 रु. info@rajkamalprakashan.com एक नई दिशा तो दी ही थी सुरेंद्र प्रताप सिंह ने हिंदी पत्रकारिता को, नई सोच भी दी थी. लोग उन्हें प्यार से एस.पी. कहते थे. 1970 के बाद हिंदी पत्रकारिता ने एक नया मोड़ लिया था. यह न केवल आकार में व्यापक हो रही थी, बल्कि अपनी प्रवृत्तियों में भी प्रयोगधर्मी बन रही थी. 1970 के पहले तक हिंदी के ज्यादातर संपादक मूलत: साहित्यकार होते थे और पत्रकारिता दोयम दर्जे का काम माना जाता था. एस.पी. की पीढ़ी ने इन मुहावरों को तोड़ा. जद्दोजहद के लिए तैयार हिंदी पत्रकारों की एक ऐसी पीढ़ी आई, जिसने इसे पेशे के रूप में अपनाया और पेशेवर गुणवत्ता भी हासिल की. इस पीढ़ी को तैयार करने में एस.पी. की बड़ी भूमिका है और इसके लिए वे याद किए जाते रहेंगे. लेकिन उ...

योगेंद्र यादव गलत हैं. एसपी सिंह का ‘आजतक’ कभी भी जातिगत विविधता की सटीक तस्वीर नहीं था

  आजतक न्यूज़ रूम में मुख्य रूप से गैर-ब्राह्मण सवर्ण व्यक्ति शामिल थे. और मृणाल पांडे की प्रशंसा चयनात्मक है साथ ही यह कई जटिल प्रश्नों की जवाब ढूंढती है. जितेंद्र कुमार 14 June, 2023 आजतक’ चैनल पर हाल ही में एक बहस के दौरान, एंकर चित्रा त्रिपाठी और राजनीतिक विज्ञानी से समाजिक कार्यकर्ता बने योगेंद्र यादव ने जाति, राजनीति और मीडिया सहित विभिन्न विषयों पर चर्चा की. अपने विचार-विमर्श के दौरान योगेंद्र यादव ने भारतीय जनता पार्टी और खासकर हिंदी मीडिया में ‘उच्च’ जाति – विशेष रूप से ब्राह्मण – के वर्चस्व के मुद्दे को उठाकर संबोधित किया. वह मीडिया इंडस्ट्री में जातिवादी उदासीनता का जवाब दे रहे थे खासकर चित्रा त्रिपाठी के उस बयान का जिसमें उन्होंने कहा था- “एक समय जब देश में 20 में से 10 मुख्यमंत्री ब्राह्मण थे”. चर्चा को एक साधारण “ब्राह्मण बनाम यादव” के लेबल तक सीमित करने के बजाय इसकी जटिलताओं के बारे में बात करना जरूरी है. 24 मई को दिप्रिंट में प्रकाशित एक लेख में, यादव का उद्देश्य कुछ बिंदुओं को स्पष्ट करना और बहस से उठी गलत धारणाओं को दूर करना था. लेख हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं ...