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संतोष भारतीय की नजर में एसपी सिंह व एमजे अकबर

  सुरेन्द्र प्रताप सिंह व एम.जे. अकबर , दो ऐसे शख्स हैं जिनके बारे में पत्रकारिता में रुचि रखने वालों को जानना ही चाहिए। पर यह भी सच है कि दोनों के बारे में सम्पूर्णता से शायद ही कोई बता सके। उतना ही बताया जा सकता है जितना अनुभव हुआ है। आज हमारे बीच एसपी नहीं हैं, पर वे जितने दिन, हमारे बीच रहे इतिहास बनाते रहे। अकबर हमारे बीच हैं लेकिन उन्होंने कभी अपने बारे में लिखा नहीं, न ही दूसरों ने उनके बारे में लिखा है। पत्रकारिता का सुनहरा काल इन दोनों को मिलाकर ही जाना जा सकता है। ये एम.जे. अकबर ही थे जो एस.पी. को कलकत्ता लाए, रविवार की जिम्मेदारी सौंपी, उन्हें आजाद छोड़ दिया और इस बात का अवसर दिया कि वे उन्हें संडे के सम्पादक के तौर पर अक्सर रविवार के सम्पादक के रूप में शह देते रहें। दोनों ने एक-दूसरे को शह दी पर सबसे खूबसूरत बात उनके रिश्ते की यह रही कि दोनों में से किसी ने एक-दूसरे को मात नहीं दी। सम्पादक के रूप में सुरेन्द्र प्रताप सिंह के काम करने की शैली किसी भी सम्पादक से अलग थी। काम करते समय वे धीर-गम्भीर रहते थे पर अचानक मजाक में गम्भीर बात कह देते थे, जब तक सामने वाला सोचे कि उ...

दिल्लीवालों ने बेटा से भतीजा बना दिया

  27 जून करीब है। एसपी इसी दिन हम लोगों से जुदा हो गए। उनकी याद में उनके पुत्र चंदन प्रताप सिंह का एक संस्मरण पेश है…   एसपी को मैं पापा कहता हूं। वो मेरे सगे पापा नहीं हैं। न हीं उन्होंने समाज के सामने ढोल पीटकर और न ही लिखा-पढ़ी कर मुझे बेटा बनाया। रिश्तों की उलझन में समझना चाहें तो वो मेरे चाचा थे। जब मैं बोलना सीख रहा था तब मेरे बाबा (दादाजी), आजी (दादीजी) और मम्मी ने कहा कि ये पापा हैं। तब से उन्हें पापा कह रहा हूं। बचपन में बड़ी मुश्किल होती थी सगे पापा और पापा के संबोधन को लेकर। लेकिन घरवालों ने इसका भी तोड़ निकाल दिया। पापा बंबई में नौकरी करने लगे थे। दोनों पापा की पहचान अलग करने के लिए मुझे सिखाया गया- कहो,  बंबइया पापा। जब मैं थोड़ा समझदार हुआ तो खुद ही इस संबोधन से बंबइया को निकाल दिया। पापा ने कभी मुझे चाचा का प्यार नहीं दिया। मुझे हमेशा बेटे का ही प्यार और दुलार मिला। हम दोनों को रिश्ते में कभी ये अहसास नहीं रहा कि वो मेरे सगे पापा नहीं हैं, वो केवल चाचा हैं। ये तो दिल्ली वालों की देन हैं,  जो मुझे बेटे के तौर पर नहीं,  भतीजे के तौर पर जानने लगे। मु...

पापा को श्मशान छोड़ अकेले घर लौटा

  दिल्ली में पत्रकारिता करने लगा तो शुरुआत में दैनिक आज के श्री सत्य प्रकाश असीम जी,  दैनिक हिंदुस्तान के के.के. पांडेय जी और साप्ताहिक हिंदुस्तान के श्री राजेंद्र काला जी ने बेहद प्रोत्साहित किया। लेकिन सहीं मायनों में मुझे श्री आलोक तोमर जी ने करंट न्यूज़ के जरिए ब्रेक दिया। पाक्षिक से साप्ताहिक बनने वाली अमित नंदे की पत्रिका की टीम में मुझे आलोक कुमार, कुमार समीर सिंह,  अनामी शरण बबल और फोटोग्राफर अनिल शर्मा जैसे दोस्त मिले। मैं दिल्ली में रहकर भी पापा के साथ नहीं रहता था।  शुरू में तकलीफ हुई। लेकिन पापा ने साफ कहा कि जहां मेरी मदद की जरूरत पड़े, आ जाना, लेकिन इस महानगर में तुम्हें अपने पैरों पर खड़ा होना है। तुम्हे आटा–दाल का भाव मालूम होना चाहिए। खैर, नब्बे के दशक में मुझे ढाई हजार रुपए पगार मिलते थे। पापा ने बस इतना ही कहा था कि कंक्रीट के इस महानगर में राजमिस्त्री भी इतना कमा लेता है। एक अच्छी लाइफ स्टाइल के लिए ये पैसे कम है। बहरहाल, पापा जब भी कलकत्ता जाते, मुझे पहले ही बता देते कि इस तारीख को जा रहा हूं, तुम भी पहुंच जाना। पापा हवाई रास्ते से पहुंचे और मैं ...

एसपी की स्मृति में : 27 जून को पीसीआई में सभा

  मशहूर पत्रकार सुरेंद्र प्रताप सिंह उर्फ एसपी सिंह बारह साल पहले 27 जून को हम सभी से जुदा हो गए थे। उनकी पुण्यतिथि पर, उनकी याद में, उनसे जुड़े कुछ पत्रकारों ने, इस बार एक साथ बैठने का मन बनाया है। सभी एसपी को याद करेंगे। उनसे जुड़ी स्मृतियों को साझा करेंगे। पत्रकारिता में एसपी की परंपरा को और ज्यादा जीवित व जीवंत बनाने के लिए बात करेंगे। यह कार्यक्रम दिल्ली में रायसीना रोड पर स्थित प्रेस क्लब आफ इंडिया (पीसीआई) में 27 जून, दिन शनिवार को रखा गया है। समय है शाम तीन बजे से छह बजे तक का। इस कार्यक्रम का वैसे तो कोई घोषित तौर पर आयोजक नहीं है लेकिन एसपी के पुत्र चंदन प्रताप सिंह आयोजन का जिम्मा संभाल रहे हैं। चंदन प्रताप सिंह ने बी4एम को बताया कि पापा से जुड़े रहे सभी लोगों से एक-एक कर अनुरोध किया जाएगा कि वे इस स्मृति सभा में पहुंचें लेकिन अगर किसी तक निजी आमंत्रण नहीं पहुंच पाता है तो कृपया इस खबर को ही अधिकृत आमंत्रण समझें और 27 जून को शाम तीन बजे प्रेस क्लब पहुंचें। स्मृति सभा से संबंधित किसी अन्य जानकारी के लिए आप चंदन से pratap.chandan@gmail.com या 09350499201 के जरिए संपर्क...

लो भाई, मैंने चुका दिया एसपी का कर्जा!

  पुण्यतिथि 27 जून के मौके पर इस युग में हिंदी पत्रकारिता को सार्थक आयाम देने, उसे तथ्यपरक, सशक्त और बोधगम्य बनाने में सुरेंद्र प्रताप सिंह का बहुत महत्वपूर्ण योगदान रहा है। वे हिंदी के प्रबल हिमायती थे और कभी भी उनको यह पसंद नहीं था कि उनकी सक्षम भाषा को अंग्रेजी की बैसाखी थमायी जाये। हम लोग आनंद बाजार प्रकाशन समूह के हिंदी साप्ताहिक ‘रविवार’ में उनके संपादकत्व में कार्य करते वक्त इस वक्त के साक्षी बने। उस पत्रिका में शायद ही कभी अनुवाद छपता रहा हो। सारी आमुख कथाएं, विशेष रिपोर्ट हमारे सहयोगी पत्रकार मूल रूप से हिंदी में ही करते थे। कभी-कभार एमजे अकबर, केवल वर्मा या कुलदीप नैयर के आलेख ही अंग्रेजी में आते थे जिन्हें हम लोग हिंदी में अनुदित कर ले लेते थे। इसके अलावा कभी ऐसा नहीं हुआ कि हमें पत्रिका को भरने के लिए अंग्रेजी से अनुवाद की जरूरत पड़ी हो। एसपी लिखते बहुत कम थे, हालांकि जब लिखते थे तो मन खुशी से भर जाता था। उनकी लिखने की शैली, शब्द चयन और उन्हें सजाने का शिल्प लाजवाब था। ऐसा कि हम उनके लिखे या अनुवाद की गयी राजनीतिक रिपोर्ट में भी साहित्य का मजा ले लेते थे। जनार्दन ठाकुर ...

दिल्ली के बड़े पत्रकार और एसपी की याद

  सुरेंद्र प्रताप उर्फ एसपी को याद करने दिल्ली में 27 जून दिन शनिवार, दोपहर 3 बजे, पत्रकारों की जो जुटान हुई, उसके बिखरने का वक्त था। ऐलान भी कर दिया गया। तभी एक लड़की मंच की तरफ आती है। कुछ कहने की इजाजत मांगती है। संचालक ने सभी से अनुरोध किया- प्लीज रुक जाइए, इनकी भी सुन जाइए। और वह लड़की बोली। जो जहां जिस मुद्रा में था, रुका। कुछ ने उसके सवाल करने के जज्बे को सराहा। कुछ ने जवाब देने की कोशिश की। लेकिन बिखरती सभा को कितनी देर संभाला जा सकता था, सो, सब लोग चले गए। लड़की भी सवाल को दिमाग में चकरघिन्नी की तरह घुमाते सवाल की तरह चली गई। उसे जवाब न मिला। मिलना भी न था। दरअसल, पुण्यतिथि के मौके पर एसपी की याद में प्रेस क्लब आफ इंडिया के सभागार में जो सभा आयोजित हुई, सच मायने में वो शुरू ही तब हुई जब बिखरने लगी। और वह शुरुआत उसी अनजान लड़की ने की। पर वक्त हो चुका था। लड़की ने जो शुरुआत की, वह उसी लड़की पर ही खत्म हो गई। लड़की, जिसने अपना नाम शिखा बताया, जिसने खुद को बिजनेस स्टैंडर्ड में कार्यरत बताया, ने मासूमियत और भोलेपन के साथ जो सवाल किया, वह बहुत सामान्य था लेकिन आज के दौर के ...