SP Singh was a founder and editor of weekly newspaper Ravivar In 1985 SP joined as the Resident Editor of Bombay NBT , later he was promoted to Executive Editor. SP had also written the dialogues for film 'Par' released in 1984. He was also associated with Telegraph, India Today and BBC for a short time. in 1995, he became the first editor of 'Aaj Tak' on Doordarshan . On the morning of 16 June 1997, SP had brain hemorrhage. On June 27, doctors of Apollo Hospital declared him dead.
योगेंद्र यादव गलत हैं. एसपी सिंह का ‘आजतक’ कभी भी जातिगत विविधता की सटीक तस्वीर नहीं था
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आजतक न्यूज़ रूम में मुख्य रूप से गैर-ब्राह्मण सवर्ण व्यक्ति शामिल थे. और मृणाल पांडे की प्रशंसा चयनात्मक है साथ ही यह कई जटिल प्रश्नों की जवाब ढूंढती है.
एसपी सिंह के बाद की टीवी पत्रकारिता 16 जून 1997। सुबह का समय। सुरेंद्र प्रताप सिंह अचानक घर पर गिर पड़े। दोपहर होते होते पता चला कि ये साधारण बेहोशी नहीं थी। कोमा में थे एसपी। ब्रेन हेमरेज हो गया था। एसपी अपने जीवन के चौथे दशक में ही थे। 27 जून को अपोलो अस्पताल के डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। दिल्ली के लोदी रोड शवदाह गृह में उनके भतीजे और पत्रकार चंदन प्रताप सिंह ने शव को मुखाग्नि दी। ग्यारह साल बाद आज पत्रकारिता, खासकर हिंदी टीवी न्यूज पत्रकारिता एक रोचक दौर में है। भारत में टीवी पत्रकारिता में मॉडर्निटी की शुरुआत आप एसपी के आज तक से मान सकते हैं। जिन लोगों ने एसपी का काम देखा है, या सुना है, या उनसे जुड़ी किसी चर्चा में शामिल हुए हैं, या उनके बारे में कोई राय रखते हैं, उनकी और बाकी सभी की प्रतिक्रियाएं आमंत्रित हैं। ये एस पी को श्रद्धांजलि देने का समय नहीं है। इसकी जरूरत भी नहीं है। एसपी मठ तोड़ने के हिमायती थे। ये क्या कम आश्चर्य की बात है कि एसपी के लगभग पांच सौ या उससे भी ज्यादा लेख और इंटरव्यू यहां-वहां बिखरे हैं, लेकिन उनका संकलन अब तक नहीं छप ...
Just about a week ago, an hour-and-a-half of nirgun bhajans at a quiet function in the Capital marked the passage of two year since Surendra Pratap Singh was removed from the midst of his family and friends by a cerebral stroke. At the India International Centre(IIC), people driven by diverse persuasions and with varying backgrounds gathered, drawn by a common chord that SP Singh represented to all of them. As always, time has flown. The last two years have been consumed in a particularly inordinate, and chaotic, hurry. The media, which SP Singh first as a print journalist and later as the brain behind Aaj Tak, impacted in a decisive fashion, has had its hands full. It has been full time, demanding job to report, comment and analyse events that are even now shaping India of the next millennium. Pictures and words struggle to capture the defining moments of the nation’s pell mell entry into the 21st Century. The formation of a saffron-led Government at the Centre, the momentous Pok...
सवाल- आप प्रिंट मीडिया से एलेक्ट्रानिक मीडिया में आ गए हैं। अपनी उपस्थिति में कैसा अंतर पाते हैं?जवाब- किसी माध्यम या संस्थान में निजी उपस्थिति का क़ायल मैं कभी नहीं रहा। मैंने जहां भी काम किया, टीम वर्क की तरह काम किया। अख़बार में भी जब मैं था तो पहले पन्ने पर दस्तख़त करके कुछ भी लिखकर छपने की वासना मुझमें नहीं रही। हिंदी में तो इसकी परंपरा ही रही है। मैं भी चाहता तो ऐसा अक्सर कर सकती था। अब टेलीविज़न के लिए काम करना मुझे रास आ रहा है। बतैर प्रोफेशन मैं यहां पहले से ज़्यादा संतुष्ट हूं। क्योंकि यहां लफ़्फ़ाज़ी और छल की गुंजाइश नहीं है। आलस्य और मिथ्या पत्रकारिता यहां नही चल सकती। जैसा कि कुछ लोग अनजान सूत्रों के हवाले से कुछ भी लिखते रहे हैं। यहां तो आप जो कुछ भी आप टिप्पणी करते हैं, उसे दिखाना पड़ता है। ये बात अलग है कि यहां ग्लैमर ज़्यादा है। सवाल- आजकल हिंदी अख़बारों पर संकट की हर जगह चर्चा हो रही है। आपको क्या लगता है ? जवाब- ये उनके गोर अज्ञान की अभिव्यक्ति है। हिंदी पत्रकारिता का स्वर्ण युग चल रहा है। हिंदी और भाषाई अख़बारों की पाठक संख्या, पूंजी, विज्ञापन और मुनाफा लगातार ...
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