चेलों ने एसपी को बढ़ा-चढ़ा कर पेश कियाः विष्णु नागर
इंटरव्यू – विष्णु नागर (वरिष्ठ पत्रकार – साहित्यकार) : भाग दो : एसपी सिंह को बहुत ज्यादा हाइप दिया गया : कुछ लोग संगठित ढंग से रघुवीर सहाय के महत्व को कम आंक कर एसपी की इमेज को बढ़ा-चढ़ा कर पेश करते रहे : एसपी की शिष्य मंडली बहुत बड़ी थी, जो रघुवीर सहाय ने क्रियेट नहीं की : ‘रविवार’ ने ओरिजनल पत्रकारिता नहीं की, ‘दिनमान’ और ‘धर्मयुग’ का मिश्रण था ‘रविवार’ : धर्मवीर भारती का आतंक हुआ करता था, लेकिन एसपी उनसे नहीं डरते थे : रघुवीर सहाय में उनके अपने बहुत आग्रह भी थे : विद्यानिवास मिश्र और अजय उपाध्याय का कार्यकाल मेरे लिए अच्छा नहीं रहा : विद्यानिवास जी ने हम जैसे कई लोगों को बिल्कुल किनारे लगा दिया : अजय उपाध्याय उलझे-उलझे आदमी लगे, उनके अंदर सुलझापन नहीं था : मुझे बड़ा पत्रकार माने या ना मानें, लेकिन लेखक ना मानें तो बुरा लगेगा : मुझे बौद्धिक खुराक अंग्रेजी से मिलती है : बहुत गरीबी देखी थी, तो स्थिरता की इच्छा मन में हमेशा रही : इस दौर में जीने के लिए किसी न किसी लेवल पर क्रियेटिव होना पड़ेगा : विभूति नारायण राय जैसे समझदार आदमी को किसी के बारे में अभद्र टिप्पणी नहीं करनी चाहिए थी : पत्रकारिता और लेखन, दोनों क्षेत्र में संजय खाती व संजय कुंदन अच्छा काम कर रहे : अंग्रेजी ब्लॉगों में वैविध्य ज्यादा है, हिन्दी में गाली-गलौज काफी है : बड़े अखबार और पत्रिकाएं पूर्ण रूप से व्यावसायिक हो गई हैं, इनमें मिशनरी ढंग से काम करना मुश्किल है : हिन्दी के साधारण लोगों से हिन्दी के न्यूज चैनलों का कोई संबंध नहीं है : अब मैं देखता हूं कि हिन्दी के अखबारों में गरीबों के खिलाफ तमाम खबरें छपती हैं : घर का आपको सपोर्ट न हो, पत्नी का सपोर्ट ना हो तो आप कुछ नहीं कर सकते : मैं कुछ मामलों में जिद्दी हो चला हूं, व्यावहारिक तौर पर इतना जिद्दी होना ठीक नहीं है :
-अपने पत्रकारीय जीवन के तीन बेस्ट एडिटरों के नाम बताइये.
-मैं फिलहाल तो दो लोगों के ही नाम लूंगा. रघुवीर सहाय और राजेंद्र माथुर. रघुवीर सहाय, जिनकी कवि के रूप में बहुत ज्यादा ख्याति है इसलिए लोग उनके संपादक पक्ष को दबा देते हैं. हिन्दी में एक सबसे बुरी बात यह है कि यहां माना जाता है कि जो लेखक है, वो अच्छा पत्रकार नहीं हो सकता या पत्रकार हो ही नहीं सकता. यह एक भ्रांत धारणा काफी समय से चली आ रही है, जबकि आप देखिए तो हिन्दी पत्रकारिता के इतिहास की शुरुआत से ही साहित्यकार पत्रकारिता से जुड़े रहे है. हिन्दी का साप्ताहिक धर्मयुग की सफलता एक साहित्यकार के कारण ही संभव हुई. उस जमाने में धर्मयुग सबसे लोकप्रिय था. न सिर्फ लोकप्रिय बल्कि बौद्धिक-रचनात्मक रूप से भी बेहतर था. धर्मवीर भारती, जो बुनियादी रूप से साहित्यकार थे, ने धर्मयुग को कामर्शियली सक्सेस बनाकर दिखाया. अज्ञेय जी ने दिनमान की जैसी शुरुआत की, जिसमें मनोहर श्याम जोशी, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, रघुवीर सहाय, प्रयाग शुक्ल, श्रीकांत वर्मा जैसे लोग जुड़े, इसका उस समय अपना महत्व था. इस साप्ताहिक की तब तक एक अलग पहचान और अलग जगह रही, जब तक रघुवीर सहाय दिनमान में रहे. इसका जो एक बौद्धिक स्तर था वह बाद में किसी व्यवसायिक साप्ताहिक का नहीं रहा. फिल्म जगत, समकालीन कला में क्या हो रहा है, इसकी जानकारी देने का चलन दिनमान ने शुरू किया. फिल्म और कला समीक्षा की भाषा इसी ने दी. दिनमान ने तमाम ऐसे इश्यू उठाये, जिन्हें उस जमाने के अखबार उठाने की सोच भी नहीं सकते थे.
दिनमान में पाठक प्रतियोगिता होती थी. एक बार प्राथमिक स्कूलों की दशा के बारे में पाठकों से पूछा गया था. इसमें ढेरो पत्र आते थे, तीन पत्रों को पुरस्कृत किया जाता था. स्कूल की दशा वाले मामले में ग्रामीण क्षेत्रों से तमाम पत्र आए, जिससे हम लोगों को पहली बार पता लगा कि इन क्षेत्रों में स्कूलों की दशा क्या है? यह पहली बार विषय बना. दिनमान में जमीन से जुड़ी तमाम खबरें आती थीं. पटना में आई बाढ़ पर फणीश्वर नाथ रेणु ने जो रिपोर्ट दिनमान में लिख दी, वैसी क्या कोई रिपोर्टर लिख सकता था? दिनमान ने ऐसे रिपोर्टों के लिए बड़ी जमीन तैयार की. ढेर सार काम किया है. बाद में रविवार ने भी काम किया लेकिन उसमें कोई ओरिजनलिटी नहीं थी. वह दिनमान और धर्मयुग का मिश्रण था. कुछ लोग संगठित ढंग से रघुवीर जी के महत्व को कम आंक कर एसपी सिंह की इमेज को ज्यादा बढ़ा-चढ़ा कर पेश करते रहे. मैं एसपी सिंह का विरोधी नहीं हूं, उनका मित्र रहा हूं. पर गुट बनाकर किसी के महिमामंडन का मैं विरोधी हूं. रघुवीर सहाय ने कभी अपना गुट नहीं बनाया. इसलिए उनकी पत्रकारिता के महत्व को कम आंकने की कोशिशें हुई हैं.
-ऐसा कहा जाता है कि एसपी सिंह ने पत्रकारिता को साहित्यकारों के चंगुल से मुक्त कराया था.
–अगर एसपी सिंह की बात कहूं तो मैं उनका मित्र रहा हूं. वो मेरे अच्छे मित्र थे. जब वो धर्मयुग में सब एडिटर हुआ करते थे और मैं ट्रेनी के रूप में वहां आया था. वो सक्षम आदमी थे. उस जमाने में धर्मवीर भारती का आतंक था, लोग उनसे डरते थे, लेकिन एसपी धर्मवीर भारती से नहीं डरते थे. अपना काम बहुत सक्षमता से करते थे और बहुत कम समय में करते थे. आराम से घूमते-घामते थे. लोगों से मिलते-जुलते थे. टाइम्स ऑफ इंडिया में अंग्रेजी जर्नलिस्टों से अच्छी मित्रता थी, पढ़ते-लिखते रहते थे, उस रूप में मैं उन्हें जानता रहा. यहां आने के बाद जाहिर है कि वो मेरे बॉस हो गए. मेरे घर भी आए हैं दो बार.
मैं उनके सक्षम होने पर कोई टिप्पणी नहीं कर रहा हूं. उन्होंने अच्छे तरीके से रविवार निकाला, लेकिन इस दौरान कुछ लोगों ने मिलकर ऐसा माहौल बनाया कि दिनमान कुछ नहीं है, जो है बस रविवार ही है, जबकि रविवार ने बहुत कुछ धर्मयुग और दिनमान से लिया. रविवार ने ओरिजनल पत्रकारिता नहीं की. यह कह सकते हैं कि रविवार आपात काल के बाद निकला था, तो उसमें आक्रामकता ज्यादा थी, लेकिन उसे मैं मौलिक पत्रकारिता नहीं मानता. हां, उसने अपने जमाने में पॉपुलर पत्रकारिता की. जब तक एसपी सिंह थे, कोई उस जमाने में रविवार पढ़े बिना नहीं रह सकता था. वो एक जरूरत बन गई थी. मैं समझता हूं कि जो बुनियादी काम किया वो दिनमान ने किया. दिनमान के कई रिपोर्ट तब भी सबसे बेहतर महसूस होती थी, हालांकि मैं एसपी के योगदान को कम करके नहीं मान रहा हूं. न्यूज चैनल आज तक उनका ही देन है, लेकिन उनको बहुत ज्यादा हाइप दिया गया, क्योंकि उनकी शिष्य मंडली बहुत बड़ी थी, जो रघुवीर सहाय ने क्रियेट नहीं की.
खैर, ये सब मूल्यांकन की बातें हैं. और एसपी सिंह नहीं रहे तो मैं उनमें कोई कमी नहीं निकालना चाहता, लेकिन ये मेरा फ्रैंक ओपीनियन है कि बुनियादी काम दिनमान ने किया. रघुवीर सहाय बड़े लेखक के अलावा कवि तो बहुत बड़े थे ही, इसके बारे में किसी को भी आज संदेह नहीं है. पर रघुवीर सहाय का दिनमान एक अलग तरह का ही दिनमान था. ऐसी पत्रकारिता ना पहले हुई थी और ना ही बाद में हो सकती है. स्थितियां बहुत बदल चुकी हैं. ठीक है रघुवीर सहाय में उनके अपने बहुत आग्रह भी थे, जैसे वे समाजवादी पृष्ठभूमि के थे तो समाजवादियों को प्रमुखता मिलती थी. झुकाव उस तरफ ज्यादा था लेकिन ये कोई दुर्गुण नहीं था. उस जमाने के तमाम अखबार कांग्रेस की चमचागिरी में लगे हुए थे. इंदिरा गांधी की चमचागिरी में लगे रहते थे. ऐसे में एक अखबार अगर विपक्ष के एक बड़े हिस्से के लिए काम कर रहा था तो कोई बुरी बात नहीं थी. अगर आप ओवरऑल देखें तो उसमें बहुत बड़ा योगदान दिनमान का था.
PublishedAugust 31, 2010
https://www.bhadas4media.com/old/vishnu-nagar-4/
-अपने पत्रकारीय जीवन के तीन बेस्ट एडिटरों के नाम बताइये.
-मैं फिलहाल तो दो लोगों के ही नाम लूंगा. रघुवीर सहाय और राजेंद्र माथुर. रघुवीर सहाय, जिनकी कवि के रूप में बहुत ज्यादा ख्याति है इसलिए लोग उनके संपादक पक्ष को दबा देते हैं. हिन्दी में एक सबसे बुरी बात यह है कि यहां माना जाता है कि जो लेखक है, वो अच्छा पत्रकार नहीं हो सकता या पत्रकार हो ही नहीं सकता. यह एक भ्रांत धारणा काफी समय से चली आ रही है, जबकि आप देखिए तो हिन्दी पत्रकारिता के इतिहास की शुरुआत से ही साहित्यकार पत्रकारिता से जुड़े रहे है. हिन्दी का साप्ताहिक धर्मयुग की सफलता एक साहित्यकार के कारण ही संभव हुई. उस जमाने में धर्मयुग सबसे लोकप्रिय था. न सिर्फ लोकप्रिय बल्कि बौद्धिक-रचनात्मक रूप से भी बेहतर था. धर्मवीर भारती, जो बुनियादी रूप से साहित्यकार थे, ने धर्मयुग को कामर्शियली सक्सेस बनाकर दिखाया. अज्ञेय जी ने दिनमान की जैसी शुरुआत की, जिसमें मनोहर श्याम जोशी, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, रघुवीर सहाय, प्रयाग शुक्ल, श्रीकांत वर्मा जैसे लोग जुड़े, इसका उस समय अपना महत्व था. इस साप्ताहिक की तब तक एक अलग पहचान और अलग जगह रही, जब तक रघुवीर सहाय दिनमान में रहे. इसका जो एक बौद्धिक स्तर था वह बाद में किसी व्यवसायिक साप्ताहिक का नहीं रहा. फिल्म जगत, समकालीन कला में क्या हो रहा है, इसकी जानकारी देने का चलन दिनमान ने शुरू किया. फिल्म और कला समीक्षा की भाषा इसी ने दी. दिनमान ने तमाम ऐसे इश्यू उठाये, जिन्हें उस जमाने के अखबार उठाने की सोच भी नहीं सकते थे.
दिनमान में पाठक प्रतियोगिता होती थी. एक बार प्राथमिक स्कूलों की दशा के बारे में पाठकों से पूछा गया था. इसमें ढेरो पत्र आते थे, तीन पत्रों को पुरस्कृत किया जाता था. स्कूल की दशा वाले मामले में ग्रामीण क्षेत्रों से तमाम पत्र आए, जिससे हम लोगों को पहली बार पता लगा कि इन क्षेत्रों में स्कूलों की दशा क्या है? यह पहली बार विषय बना. दिनमान में जमीन से जुड़ी तमाम खबरें आती थीं. पटना में आई बाढ़ पर फणीश्वर नाथ रेणु ने जो रिपोर्ट दिनमान में लिख दी, वैसी क्या कोई रिपोर्टर लिख सकता था? दिनमान ने ऐसे रिपोर्टों के लिए बड़ी जमीन तैयार की. ढेर सार काम किया है. बाद में रविवार ने भी काम किया लेकिन उसमें कोई ओरिजनलिटी नहीं थी. वह दिनमान और धर्मयुग का मिश्रण था. कुछ लोग संगठित ढंग से रघुवीर जी के महत्व को कम आंक कर एसपी सिंह की इमेज को ज्यादा बढ़ा-चढ़ा कर पेश करते रहे. मैं एसपी सिंह का विरोधी नहीं हूं, उनका मित्र रहा हूं. पर गुट बनाकर किसी के महिमामंडन का मैं विरोधी हूं. रघुवीर सहाय ने कभी अपना गुट नहीं बनाया. इसलिए उनकी पत्रकारिता के महत्व को कम आंकने की कोशिशें हुई हैं.
-ऐसा कहा जाता है कि एसपी सिंह ने पत्रकारिता को साहित्यकारों के चंगुल से मुक्त कराया था.
–अगर एसपी सिंह की बात कहूं तो मैं उनका मित्र रहा हूं. वो मेरे अच्छे मित्र थे. जब वो धर्मयुग में सब एडिटर हुआ करते थे और मैं ट्रेनी के रूप में वहां आया था. वो सक्षम आदमी थे. उस जमाने में धर्मवीर भारती का आतंक था, लोग उनसे डरते थे, लेकिन एसपी धर्मवीर भारती से नहीं डरते थे. अपना काम बहुत सक्षमता से करते थे और बहुत कम समय में करते थे. आराम से घूमते-घामते थे. लोगों से मिलते-जुलते थे. टाइम्स ऑफ इंडिया में अंग्रेजी जर्नलिस्टों से अच्छी मित्रता थी, पढ़ते-लिखते रहते थे, उस रूप में मैं उन्हें जानता रहा. यहां आने के बाद जाहिर है कि वो मेरे बॉस हो गए. मेरे घर भी आए हैं दो बार.
मैं उनके सक्षम होने पर कोई टिप्पणी नहीं कर रहा हूं. उन्होंने अच्छे तरीके से रविवार निकाला, लेकिन इस दौरान कुछ लोगों ने मिलकर ऐसा माहौल बनाया कि दिनमान कुछ नहीं है, जो है बस रविवार ही है, जबकि रविवार ने बहुत कुछ धर्मयुग और दिनमान से लिया. रविवार ने ओरिजनल पत्रकारिता नहीं की. यह कह सकते हैं कि रविवार आपात काल के बाद निकला था, तो उसमें आक्रामकता ज्यादा थी, लेकिन उसे मैं मौलिक पत्रकारिता नहीं मानता. हां, उसने अपने जमाने में पॉपुलर पत्रकारिता की. जब तक एसपी सिंह थे, कोई उस जमाने में रविवार पढ़े बिना नहीं रह सकता था. वो एक जरूरत बन गई थी. मैं समझता हूं कि जो बुनियादी काम किया वो दिनमान ने किया. दिनमान के कई रिपोर्ट तब भी सबसे बेहतर महसूस होती थी, हालांकि मैं एसपी के योगदान को कम करके नहीं मान रहा हूं. न्यूज चैनल आज तक उनका ही देन है, लेकिन उनको बहुत ज्यादा हाइप दिया गया, क्योंकि उनकी शिष्य मंडली बहुत बड़ी थी, जो रघुवीर सहाय ने क्रियेट नहीं की.
खैर, ये सब मूल्यांकन की बातें हैं. और एसपी सिंह नहीं रहे तो मैं उनमें कोई कमी नहीं निकालना चाहता, लेकिन ये मेरा फ्रैंक ओपीनियन है कि बुनियादी काम दिनमान ने किया. रघुवीर सहाय बड़े लेखक के अलावा कवि तो बहुत बड़े थे ही, इसके बारे में किसी को भी आज संदेह नहीं है. पर रघुवीर सहाय का दिनमान एक अलग तरह का ही दिनमान था. ऐसी पत्रकारिता ना पहले हुई थी और ना ही बाद में हो सकती है. स्थितियां बहुत बदल चुकी हैं. ठीक है रघुवीर सहाय में उनके अपने बहुत आग्रह भी थे, जैसे वे समाजवादी पृष्ठभूमि के थे तो समाजवादियों को प्रमुखता मिलती थी. झुकाव उस तरफ ज्यादा था लेकिन ये कोई दुर्गुण नहीं था. उस जमाने के तमाम अखबार कांग्रेस की चमचागिरी में लगे हुए थे. इंदिरा गांधी की चमचागिरी में लगे रहते थे. ऐसे में एक अखबार अगर विपक्ष के एक बड़े हिस्से के लिए काम कर रहा था तो कोई बुरी बात नहीं थी. अगर आप ओवरऑल देखें तो उसमें बहुत बड़ा योगदान दिनमान का था.
PublishedAugust 31, 2010
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