Wednesday, June 25, 2008

एक दलित पत्रकार की तलाश है...

..जो किसी मीडिया संस्थान में महत्वपूर्ण पद पर हो। आप पूछेंगे ये एक्सरसाइज क्यों? बारह साल पहले वरिष्ठ पत्रकार बी एन उनियाल ने यही जानने की कोशिश की थी। 16 नवंबर 1996 को पायोनियर में उनका चर्चित लेख इन सर्च ऑफ अ दलित जर्नलिस्ट छपा था। उस समय उन्होंने प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो के एक्रिडेटेड जर्नलस्ट की पूरी लिस्ट खंगाल ली थी। प्रेस क्लब के सदस्यों की सूची भी देख ली। लेकिन वो अपने मित्र विदेशी पत्रकार को मुख्यधारा के किसी दलित पत्रकार से मिलवा नहीं पाए। उनियाल साहब के काम को पाथब्रेकिंग माना जाता है और इसकी पूरी दुनिया में चर्चा हुई थी।

1996 के बाद से अब लंबा समय बीत चुका है। क्या हालात बदले हैं? यकीन है आपको? जूनियर लेवल पर कुछ दलितों की एंट्री का तो मै कारण भी रहा हूं और साक्षी भी। लेकिन क्या भारतीय पत्रकारिता में समाज की विविधता दिखने लगी है? अभी भी ऐसा क्यों हैं कि जब मैं पत्रकारिता के किसी सवर्ण छात्र को नौकरी के लिए रिकमेंड करके कहीं भेजता हूं तो उसे कामयाबी मिलने के चांस ज्यादा होते हैं। दलित और पिछड़े छात्रों को बेहतर प्रतिभा के बावजूद नौकरी ढूंढने में अक्सर निराशा क्यों हाथ लगती है? क्या जातिवाद की बीमारी मीडिया के बोनमैरो में घुसी हुई है। क्या हम इसके लिए शर्मिंदा है? क्या हम इस पाप का प्रायश्चित्त करने के लिए तैयार हैं?

( आज ये लिखते हुए मुझे एस पी सिंह याद आ रहे हैं, पत्रकारिता में सामाजिक विविधता लाने के लिए वो हमेशा सचेत रहे। मेरा और मेरी तरह के कुछ दर्जन लोगों का पत्रकारिता में आना उनकी ही वजह से हो पाया। मुझे याद है कि मंडल कमीशन विरोधी आंदोलन के समय उन्होंने आरक्षण के पक्ष में स्टैंड लिया था और टाइम्स हाउस में इस बात के पोस्टर लगे थे कि एसपी सिंह चमार हैं। विरोधों से टकराने की वजह से ही एसपी सिंह एसपी बन पाए। टाइम्स सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज के हर बैच में किसी न किसी मुसलमान और अवर्ण छात्र का होना कोई सामान्य बात नहीं है। एसपी सिंह और राजेंद्र माथुर को इसके लिए कितना विरोध झेलना पड़ा होगा, इसकी कल्पना मैं नहीं कर सकता। लेकिन जो धारा के साथ बहे उन्हें कौन याद रखता है? देखिए मरे हुए एसपी का नाम जिंदा लोगों से ज्यादा चर्चा में रहता है)

नस्लवाद की आदिभूमि अमेरिका के फॉक्स और सीएनएन में आपको ब्लैक, हिस्पैनिक और जैना विरजी, अंजली राव और मोनिता राजपाल जैसे भारतीय दिख जाएंगे। ये चेहरे वहां इसलिए नहीं है कि वो अनिवार्य रूप से सबसे टैलेंटेड हैं। दरअसल नस्लभेदी अतीत को लेकर अब वहां पश्चाताप है। इसलिए अब सचेत ढंग से ये कोशिश हो रही है कि अमेरिकी समाज के अलग अलग तरह के चेहरे सभी क्षेत्रों में दिखें। वहां के बड़े कॉरपोरेट गर्व के साथ कहते हैं कि उसके स्टाफ में ब्लैक की संख्या उनकी आबादी से ज्यादा है। अमेरिकी राष्ट्रपति पद के लिए एक मिली जुली नस्ल का शख्स आगे बढ़ रहा है और उसे श्वेतों का भी समर्थन है। भारत कब बदलेगा? और क्या आपका भी इसमें कोई योगदान होगा?

27 जून को एस.पी. की ग्यारहवीं पुण्यितिथि



इस सत्ताइस जून को सुरेंद्र प्रताप सिंह के देहांत के ग्यारह बरस पूरे हो रहे हैं। उपहार अग्निकांड के बाद 16 जून को उनके दिमाग़ की नसें फट गई थी। सबसे पहले उन्हे विमहेंस में एडमिट कराया गया। हालत बिगड़ने पर दोपहर में उन्हे अपोलो हॉस्पिटल में एडिमट कराया गया। ये बहुत कम लोगों को ही पता होगा कि 26 जून की देर रात को उनके दिमाग़ ने काम करना बंद कर दिया। वो इंसान, जो दिमाग़ की वजह से लोकप्रिय रहा है। 27 जून की सुबह दिल ने भी धड़कने से इनकार कर दिया।

याद है मुझे वो रात, जब डॉक्टरों ने हमें मानिसक तौर पर तैयार रहने को कह दिया था। उनकी पत्नी पर जो बीत रही थी, उसे बता पाना बेहद मुश्किल है। लेकिन जो मेरे साथ गुज़रा , उसे आज तक मैं नहीं भूला पाया हूं। जिस बरगद की छांव में मैं पला था, अचानक उसके गिरने की कल्पनाभर से मैं मटियामेट हो चुका था। मुझे अहसास हो चुका था कि मैं कमज़ोर हो चुका हूं। दिमाग़ी-ज़ेहनी तौर पर।

सेरोगट मदर के बारे में दुनिया जानती है लेकिन सैरोगट फादर का अंदाज़ा शायद न होगा। वो मेरे पिता नहीं थे। फिर भी वो मेरे पिता थे। मेरे पिता तीन भाई। सबसे बड़े मेरे पिता एन.पी., उसके बाद और एक चाचा। एन.पी. और एस.पी में बचपने से बहुत दोस्ती थी। दोनों एक दूसरे पर हमेशा क़ुर्बान होने को तैयार। मेरे पिता जी के दो बेटे हुए। बड़ा मैं और मुझसे छोटा एक भाई। एस.पी. ने बचपन में मुझे अपने बेटे का दर्जा दे दिया। ये दर्जा रागात्मक, भावनात्मक था। इसके लिए किसी क़ानूनी लिखत पढ़त की ज़रूरत हम लोगों ने नहीं समझी। पापा मेरी मां के बेहद दुलारे थे। वो उनके लिए देवर भी थे और बेटे भी। अक्सर लोगों से हंसी - मज़ाक से बचनेवाली मेरी मां उनसे मज़ाक कोई मौक़ा नहीं छोड़ती थी। याद है मुझे वो दिन। तब वो रविवार पत्रिका के संपादक थे। होली के दिन घर पर आए। मां मेरी होली नहीं खेलती थीं। पापा को देखते ही वो स्टील के एक मग में रंग भर कर ले आई औऱ पापा के ऊपर फेंक दिया। हालांकि मैं मां से ज़्यादा क़रीबी तौर पर जुड़ा हुआ था। लेकिन पापा के घर में घुसते ही मां की ये हरकत मुझे पसंद नहीं आई और मैंने उसी मग को मां की पेट पर मार दिया। मां दर्द से छटपटा उठीं और मेरे गाल पर पापा की एक ज़ोरदार चपत लगी। उस समय मैं बहुत छोटा था। लेकिन ये क़िस्सा आज भी मुझे सोचना पर मजबूर करता है कि मैं अपनी सगी मां से ज्यादा प्यार करता था या फिर पापा से।

अस्पताल में पापा के रहने के दौरान हमने लाख जतन किए। ख़ून के रिश्तों से भी बढ़कर दिबांग का रात-दिन एक करना। संजय पुगलिया की मायूस होती आंखें। अपना काम काज छोड़कर अमित जज और नंदिता जैन की मेहनत। राम बहादुर राय जी की कोशिश - पूजा पाठ और हवन के ज़रिए अनहोनी को टाला जाए। सुबह तीन बजे राय साहेब का आदेश देना- भैरव बाबा मंदिर से पुजारी को बुलाकर महामृत्युंजय जाप कराना। लेकिन सब बेकार गया।

ख़ैर पापा की मौत के बाद जब उनके पार्थिव शरीर को लेकर हम घर आने लगे तो मैं आपे में नहीं था। मैंने रामकृपाल चाचा को कहा कि वो मेरे साथ उस गाड़ी में बैठें , जिसमें बग़ैर प्राण के पापा थे। घर से कांधे पर पापा की अर्थी लेकर जब मैं चला तो यक़ीन मानिए मैं सब कुछ लुटाकर चला जा रहा था। जिसका अंश था मैं, उसे मैं जलाने जा रहा था। शम्शान घाट पर बहुत सारे लोग थे। उनमें से एक थे सीताराम केसरी , जो पापा को अपने बेटे की तरह मानते थे। उनका फूट फूटकर रोना याद है मुझे। पापा को आग के हवाले किया। मेरे साथ दिबांग ने भी पुत्र धर्म का निर्वाह किया। पापा को धू- धू जलते देख मैं बौखला उठा। मेरे पिता मेरे पास आए और कहा- सच स्वीकार करो। तेरा बाप मर चुका है। अब तुम इस दुनिया में बगैर बाप के हो। इससे पहले मेरी पंडित जी से भिड़ंत हो चुकी थी। वो मुझे मुखाग्नि पर जो़र दे रहा था। मैं उसे समझाने की कोशिश कर रहा था कि जिस व्यक्ति ने ज़िंदगीभर मेरे मुंह में अन्न देने की कोशिश की है, उसके मुंह में मैं बदले में आग कैसे दे दूं। ये कैसा धर्म है। पंडित को ये बाते समझ में नहीं आ रही थीं। लेकिन मैंने वहीं किया , जो मेरा धर्म कहता था। मैंने कपाल क्रिया से भी मना कर दिया।

रात को पापा के कमरे में अकेले बैठा था। कोलकाता से निर्मल दा आ चुके थे। मना करने पर भी उन्होने आज तक चैनल लगा दिया। दूरदर्शन पर संजय पुगलिया दिखे। आवाज़ भर्राई हुई और आंखों में नमी। इसे मैने पढ़ लिया था। मैं कमरे से बाहर चला गया। लेकिन संजय की नम आंखे और रूधी आवाज आज भी मुझे हौसला देती है। वो चेहरा बताता है- अगर मैं अकेला हूं तो संजय भी तन्हा हैं। इसलिए आज मैं ख़ुद को अकेला नहीं पाता।

चंदन प्रताप सिंह

हिंदी चैनलों का कोई चरित्र नहीं बन पाया है- एस.पी.सिंह



निजी चैनलों का भारत में भविष्य कैसा है ? पत्रकारिता की शैली में यदि आप मुझसे पूछें तो मैं कहूंगा कि भविष्य बहुत अच्छा है। लेकिन इससे काम चलेगा नहीं। दूरदर्शन को एक तरह से चुनौती मिलनी शुरू हो गई है। कई तरह के चैनल हमारे सामने आ रहे हैं। इन नए चैनलों में भारतीय, विदेशी, निजी और सरकारी चैनल शामिल हैं। चैनल आते है, थोड़े दिनों तक दिखाई देते हैं और फिर ग़ायब हो जाते हैं। निजी चैनल जितने आए हैं, उनमें सफलता का प्रतिशत ज़्यादा नहीं है। व्यावसायिक कोण के बग़ैर किसी चैनल की सफलता या असफलता को आंकना आज के ज़माने में नामुमक़िन है। ये एक ऐसा माध्यम है, जिसमें करोड़ों की पूंजी लगती है। सिर्फ अच्छे कार्यक्रमों के आधार पर किसी चैनल की सफलता को नहीं आंका जा सकता। क्योंकि अगर ऐसा होता, तो डिस्कवरी चैनल एक बहुत सफल चैनल हो गया होता। फिर भी मैं कह रहा हूं कि निजी चैनल का भविष्य बेहद उज्जवल दिखाई देता है। ये कहने के लिए मेरे पास दो आंकड़े हैं। साल 1985 में विज्ञापनों पर 1.5 अरब रुपए ख़र्च किए गए। इसमें 75 प्रतिशत प्रिंट मीडिया पर ख़र्च होता था। 12 प्रतिशत रेडियो पर, 3 प्रतिशत सिनेमा पर और बाक़ी 6 फीसदी आउटडोर यानी होर्डिंग पर ख़र्च होता था। लेकिन साल 1994 में ये रक़म 35 अरब हो गई। यानी 10 साल में लगभग 400 फीसदी का इजा़फा। प्रिंट मीडिया की हिस्सेदारी 75 से घटकर 62 फीसदी हो गई। दूरदर्शन तब भी 12 वें नंबर पर था। अब भी वहीं डटा हुआ है। विज्ञापन राशि का 6 फीसदी हिस्सा सैटेलाइट टेलीविज़न के पास आ गया। इन आंकड़ों से लगता है कि निजी चैनलों का भविष्य बेहद उज्जवल है।

हम अगर हिंदी मीडिया से बार निकलकर उत्तर से दक्षिण बारत पर नज़र डालें तो हमारा दिमाग़ साफ हो जाएगा कि किस पैमाने पर वहां निजी चैनल सफलतापूर्वक चल रहे हैं। वहां पर चार चैनल तो बड़े सफल साबित हो रहे हैं, इनमें सन, जेमिनी, राज और जेजे शामिल हैं। ज़ी हिंदी का सबसे सफल चैनल है। लेकिन उस पर भी लोकप्रियता की दृष्टि से सबसे ज़्यादा देखे जानेवाले कार्यक्रम क्लोज़अप अंताक्षरी, फिलिप्स टॉप टेन औऱ कैंपस ही हैं। इनकी टीआरपी रेटिंग 10 के आस पास रहती है। दूरदर्शन की रेटिंग बहुत ऊंची है। जब महाभारत उफान पर होता है, तो टीआरपी 60-62 के आस-पास रहता है। अगर कृष्णा है तो भी 50-52 से नीचे नहीं जाता। आपकी अदालत जो एक तरह से टीवी पत्रकारिता में एक प्रतिमान क़ायम कर रहा है , वो भी लोकप्रियता में दो फीसदी से ज़्यादा नहीं है। दूसरी तरफ, तमिल के जो चैनल है और वहां पर जो उनके समाचार आते हैं, उन्हे देखने वालों का प्रतिशत 40 से 70 फीसद के बीच रहता है। ये सिर्फ तमिल ही नहीं होता, तेलगू में भी होता है और मलयालम में भी। इस बार जयललिता की हार में सन टीवी की बड़ी भूमिका रही। अंतिम दिनों में रजनीकांत ने जो बयान दिया, उसका असर ये बताता है कि जयललिता की पार्टी तमिलनाडु में पूरी तरह से साफ हो गई। आर्थिक तौर पर भी वो इतने सक्षम हैं कि वो दावे के साथ सरकार से कह रहे हैं कि आप हमें अपलिंकिग की सुविधा दीजिए, बाक़ी सारा इंतज़ाम हम ख़ुद कर लेंगे।

दक्षिण के चैनलों की तरह स्थिति हिंदी के चैनलों में नहीं बन पा रही। क्यों नहीं बन पा रही क्योंकि हिंदी के चैनलों का कोई चरित्र नहीं बन पाया है। सिर्फ सिनेमा का क्लिप लेकर आप एक लड़का और एक लड़की को ले लें और वो तरह-तरह से उछलता रहे। कभी सड़क पर, कभी चिड़ियाघर में- इस तरह के बीस प्रोग्राम आप आप हम झोंक दें और उम्मीद करें कि वो सफल हो जाएंगे। नहीं होंगे। हर तरह के प्रोग्रामों की एक सीमा होती है। अभी स्थिति ये है कि हम परीक्षण के दौर से गुज़र रहे हैं। यानी एक अंताक्षरी सफल है तो आप सौ अंताक्षरी के लिए तैयर हो जाइए। हामार बौद्धिक दिवालियापन इस हद तक है कि अगर एक हनुमान चल रहा है तो दूसरे भी आ गए हैं। मैं ये बात दावे के साथ कह रहा हूं कि तीसरे हनुमान भी आ जाएंगे। ये सिर्फ निजी चैनलों की बात नहीं है। हमारा जो दूरदर्शन है, वहां भी कल्पनाशीलता की कमी है। आज उनकी सबसे बड़ी चिंता है कि उनकी टीआरपी रेटिंग कैसी है।

हमारे देश में अशिक्षितों की संख्या सबसे ज़्यादा है। टीवी 44 फीसदी निरक्षर लोगों के घर तक पहुंचता है। पश्चिम में सैटेलाइट या इलेक्ट्रानिक मीडिया का जब हमला हुआ तब कमोबेश उस समाज में शिक्षा का एक स्तर पहुंच चुका था। जहां पर लोग कम से कम 90 प्रतिशत और कुछ जगहों पर 100 प्रतिशत साक्षर थे। वहां पर जब इसका हमला हुआ तो इसकी जो बुराइयां है, वो लोग झेल गए। हमारा देश तो वैसे भी वाचक परंपरा का देश रहा है। हम लिखने पर विश्वास कम करते हैं और बोलने में ज़्य़ादा। हमारे ज़्यादातर काव्य बोलकर लिखे गए हैं। ऐसे देश में जो बीच का स्थान था, उसे हम फलांग कर आगे निकल गए हैं। अशिक्षित लोगों के पास अब हम इतने सशक्त माध्यम लेकर जा रहे हैं , जो दृश्य भी है और श्रव्य भी । किस हद तक ये माध्यम उनको प्रभावित कर सकता है, ज़रा इसके बारे में सोचें और इसके बारे में विचार करें। इस माध्यम का अच्छा उपयोग करें तो अच्छी बात होगी। लेकिन उपयोग बुरा हुआ तो स्थिति बहुत गंभीर हो जाएगी।

क्रमश:

सुरेंद्र प्रताप सिंह यानी एस.पी. सिंह ने सितंबर 1996 में दिल्ली में ब्रिटिश उच्चायोग के हिंदी अनुभाग के एक सेमिनार में भाषण दिए थे। भाषण का बाक़ी का अंश जारी है।

चंदन प्रताप सिंह


हिंदी चैनलों का कोई चरित्र नहीं बन पाया है- एसपी के भाषण का दूसरा अंश



चिंता की बात ये है कि इलेक्ट्रानिक माध्यम व्यावसायिक सामने आया है। व्यानसायिकता ही इसकी प्राथमिकता रहेगी। मैं व्यावसायिकता के ख़िलाफ़ नहीं हूं। क्योंकि इसके ख़िलाफ़ रहते हुए हम उम्मीद करें कि सारा काम सरकार करती रहे तो ये संभव नहीं है। इसके बीच ऐसा कोई सामंज्सय बिठाया जाए ताकि व्यावसायिकता भी बनी रहे और अपसंस्कृति के ख़तरे से भी देश को दूर रखा जा सके। एक तरीक़ा ये है कि इस माध्यम को नियंत्रण से दूर रखा जाए। मुक्त करके ऐसी कोई व्यवस्था बने कि निजी या सरकारी चैनलों की , जो सामाजिक रूप से ज़िम्मेदार भी हों, जो इस चीज़ को समझें कि हमें मनोरंजन की जितनी आवश्यकता है, उतनी ही सूचना और शिक्षा की भी है।
मैं किसी एक राजनीतिक पार्टी का नाम नहीं लेना चाहता। कल कांग्रेस सत्ता में ती। तेरह दिनों के लिए बीजेपी भी सत्ता में थी। आज संयुक्त मोर्चा है। मुझे काम में कोई अंतर दिखाई नहीं देता। आज थोड़ी परेशानी और बढ़ गई है। क्योंकि उस समय एक सरकार थी। एक प्रदानमंत्री था। हमारे सामने साफ दिशा निर्देश थे कि देश में आप विभेद नहीं फैलाएंगे। दो संप्रदायों को लड़ाएंगे नहीं, आदि आदि। ये सब लिखे हुए हैं, आप पढ़ लीजिए। अलिखित ये होता है कि आप प्रधानमंत्री से अनावश्यक रूप से छेड़छाड़ नहीं करेंगे। कश्मीर के बारे में हम जैसा कहेंगे , वैसा करेंगे। आज 13 प्रधानमंत्री हैं और 26 विचारधाराएं। इन सबके अलग-अलग दिशा निर्देश हैं। इसमें कहीं कोई परिवर्तन नहीं आया है। ये एक ऐसा माध्यम है, अगर इस पर एक बार आप अपना चेहरा देख लें तो अपने चेहरे को बार-बार देखने की आदत पड़ जाएगी।
नौकरशाही की भूमिका ये है कि इसने ये समझ लिया है कि इस देश के ज़्यादातर लोग ग़ैरज़िम्मेदार हैं। हमारा दो प्रतिशत अंग्रेज़ी में बोलनेवाला जो चैटरिंग क्लास है, उसे लोकतंत्र से ही चिढ़ होती जा रही है। लोग फूलन देवी को चुनकर भेज देते हैं। मुलायम सिंह यादव चुनाव जीतकर आ जाते हैं। देवेगौड़ा को प्रधानमंत्री बना देते हैं। इनकी राय ये है कि ये ग़ैरज़िम्मेदार लोग हैं, जो किसी को भी चुनकर भेज देते हैं। कोई भी आकर बैठ जाता है। ये जो देश है, ये जो ढ़ांचा है, ये जो स्टील फ्रेम अंग्रेज़ो ने हमें सौंपा था, इसको बनाए रखने की पूरी ज़िम्मेदारी हमारी है। नौकरशाही अपने बहुत सारे तर्क देती है। सबसे बड़ा तर्क ये है कि आकाशवाणी और दूरदर्शन मुक्त हो जाएं, तो देश की सुरक्षा को ख़तरा है। कश्मीर का मामला है, पंजाब का मामला है, हम लोग ज़ोख़िम नहीं ले सकते। हमारी संस्कृति पर ख़तरा है। लेकिन हम लोग जो समाचार दे रहे हैं, वो सारा झूठ दे रहे हैं। इसकी हमें कोई चिंता नहीं। हम जो मनोरंजन दे रहे हैं, वो तीसरे दर्ज़े से भी घटिया है। कहीं कोई सामाजिक सरोकार नहीं है।
दरअसल कुछ अख़बारवाले आतंकित हैं कि विदेशी आकर हमारा एकाधिकार समाप्त कर देंगे। वो इस तरह का हौव्वा खड़ा कर रहे हैं। कुछ ऐसे राजनीतिज्ञ और कुछ ऐसे नौकरशाह हैं. जो सत्ता में रहकर इस माध्यम का अपने हित में इस्तेमाल करना चाहते हैं। ये तभी ठोक हो पाएगा, जब निजी चैनल अपने पैरों पर खड़ा होना शुरू कर देंगे। ऐसे निजी चैनल जो भारतीय प्रतिभा के द्वारा संचालित होंगे, जो भारतीय नियमों से चलेंगे और भारतीय ज़मीन से जिनका जुड़ाव बोद्धिक स्तर पर होगा। तभी इन परिस्थितियों में सुधार आएगा।
सुरेंद्र प्रताप सिंह यानी एस.पी.सिंह ने अपनी मौत से दस महीने पहले दिल्ली में ब्रिटिश उच्चायोग के हिंदी अनुभाग के एक संगोष्ठी में भारत में निजी चैनलों के भविष्य विषय पर अपने ये विचार दिए थे। सितंबर 1996 में उनका ये विचार आज भी प्रासंगिक है।

मैं इस विलाप में शामिल नहीं हूं- एस.पी.सिंह



सवाल- आप प्रिंट मीडिया से एलेक्ट्रानिक मीडिया में आ गए हैं। अपनी उपस्थिति में कैसा अंतर पाते हैं?जवाब- किसी माध्यम या संस्थान में निजी उपस्थिति का क़ायल मैं कभी नहीं रहा। मैंने जहां भी काम किया, टीम वर्क की तरह काम किया। अख़बार में भी जब मैं था तो पहले पन्ने पर दस्तख़त करके कुछ भी लिखकर छपने की वासना मुझमें नहीं रही। हिंदी में तो इसकी परंपरा ही रही है। मैं भी चाहता तो ऐसा अक्सर कर सकती था। अब टेलीविज़न के लिए काम करना मुझे रास आ रहा है। बतैर प्रोफेशन मैं यहां पहले से ज़्यादा संतुष्ट हूं। क्योंकि यहां लफ़्फ़ाज़ी और छल की गुंजाइश नहीं है। आलस्य और मिथ्या पत्रकारिता यहां नही चल सकती। जैसा कि कुछ लोग अनजान सूत्रों के हवाले से कुछ भी लिखते रहे हैं। यहां तो आप जो कुछ भी आप टिप्पणी करते हैं, उसे दिखाना पड़ता है। ये बात अलग है कि यहां ग्लैमर ज़्यादा है।

सवाल- आजकल हिंदी अख़बारों पर संकट की हर जगह चर्चा हो रही है। आपको क्या लगता है ? जवाब- ये उनके गोर अज्ञान की अभिव्यक्ति है। हिंदी पत्रकारिता का स्वर्ण युग चल रहा है। हिंदी और भाषाई अख़बारों की पाठक संख्या, पूंजी, विज्ञापन और मुनाफा लगातार बढ़ रहा है। हां, इस वृद्धि के बरबस उनके समाचार विचार स्तर को लेकर आप चिंतित हो सकते हैं। पर ये सब समय के साथ सब ठीक हो जाएगा। दूसरी ओर आज, दैनिक जागरण, अमर उजाला, राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर सहित अनेक क्षेत्रिय अख़बार अपना विकास कर रहे हैं। जयपुर में भास्कर और पत्रिका की प्रतियोगिता से क़ीमतें नियंत्रित हुई हैं। गुणवत्ता भी सुधर जाएगी। सच तो ये है कि हिंदी पत्रकारिता अपने पैरों पर खड़ी हो रही है। हालांकि पेशे के रूप में अभूतपूर्व वृद्धि के कारण हिंदी पत्रकारिता में बड़ी मात्रा में कर पतवार आ रहे हैं। लेकिन ये स्थिति स्थाई नहीं होगी।

सवाल- इसी संदर्भ में कहा जा रहा है कि हिंदी अख़बारों की विश्वसनीयता घट रही है। जवाब- भारतीय समाज में तुलसीदास के समय से ही त्राहि-त्राहि का भाव व्याप्त रहा है। पिछले 150 सालों से तो ये रोना और तेज़ हुआ है। हर आदमी बताता फिर रहा है कि संकट काल है। कम से कम मैं इस सामूहिक विलाप में शामिल नहीं हूं। भारतीय संस्कृति मूलत विलाप की संस्कृति रही है। नरेंद्र मोहन अख़बार की बदौलत राज्यसभा पहुंच गए तो बड़ा शोर हो रहा है। 1952 से ही ये सब हो रहा है।

सवाल- पत्रकारिता के मिशन बनाम प्रोफेशन होने पर भी बहस हो रही है। आप क्या सोचते हैं ?जवाबः सरकारी सुविधाएं और पैसे लेकर निकलनेवाले अख़बारों की सामाजिक प्रतिबद्धता क्या है? ये एक फरेब है, जो हिंदी में ज़्यादा चल रहा है। पत्रकारिता क़स्बे से लेकर राजधानी तक दलाली और ठेकेदारी का लाइसेंस देती है। मैंने किसी मिशन के तहत पत्रकारिता नहीं की। मेरी प्रतिबद्धिता अपने पेशे यानी पत्रकारिता के प्रति है। आज़ादी की लड़ाई के दौरान पत्रकारिता मिशन थी। इसलिए वस्तुपरक भी नहीं थी। मिशन की पत्रकारिता हमेशा सब्ज़ेक्टिव होती है। यदि कोई पार्टी, संस्थान, आंदोलन मिशन की पत्रकारिता करे तो समझ में आती है। लेकिन नवभारत टाइम्स, जनसत्ता या हिंदुस्तान क्यों मिशन की पत्रकारिता करे ?

सवाल- मीडिया में वर्चस्व की संस्कृति को लेकर कुछ राजनेताओं ने अच्छा ख़ासा विवाद खड़ा कर दिया है। कांशीराम द्वारा पत्रकारों की पिटाई का मामला ताज़ा उदाहरण है। आपने इससे अपने आपको अलग क्यों कर लिया ?

जवाब- उसमें जातिवादी ओवरटोन ज़्यादा ता। इसलिए मैं अलग हो गया। यदि आप इस पेशे में आए हैं, तो इसकी पेशागत परेशानियों का सामना करें। वरना कोई अतिसुरक्षित पेशा चुन लें। कल्पना कीजिए यही काम किसी सवर्ण मे किया होता तो क्या ऐसा ही विरोध होता ? सवर्ण पत्रकारों ने इस घटना को दलित नेता को ज़लील करने के एक अवसर के के रूप में इस्तेमाल किया। मीडिया में प्रच्छन्न सवर्ण जातिवादी वर्चस्व है। उत्तर भारत में तो अधिकतर अख़बारों में सांप्रदायिक शक्तियां ही हावी हैं। पिछड़ों को सबक सिखाने का बाव आज भी ज़्यादातर महान क़िस्म के पत्रकारों की प्रेरणा बना हुआ है। ये वर्चस्व चूंकि समस्त भारतीय सामज में है, इसलिए मीडिया में भी है।

सवाल- साहित्य और पत्रकारिता के रिश्तों पर आपकी टिप्पणियां ख़ासा विवाद पैदा करती रही हैं। क्या आप अब भी ऐसा मानते हैं कि साहित्यकारों ने पत्रकारिता में गालमेल कर रखा है ?जवाब-भाषा की बात छोड़ दें तो विषयवस्तु या विचार के स्तर पर िकसी भी साहित्यकार संपादक ने हिंदी पत्रकारिता को कोई ज़्यादा मज़बूत किया , ऐसा मैं नहीं मानता। लेकिन ये भी सच है कि आज हिंदी पत्रकारिता की अपनी भाषा बन रही है। सारी दुनिया में पत्रकारिता की भाषा को साहित्य ने अपनाया है। हमारे यहां उलटी गंगा बहाने की कोशिश होती रही। इसे दुराग्रह नहीं तो क्या कहेंगे कि पत्रकारिता की भाषा को साहित्यिक बना दिया जाए।

मैं अक़्सर ऐसी चर्चाएं सुनता हूं कि और मेरी समझ में नहीं आता कि साहित्यकार पत्रकारिता से क्या और क्यों उपेक्षा करते हैं ? आप बेशक़ जैसी मर्ज़ी वैसी साहित्यिक पत्रकारिता करें। लेकिन बजट और विदेश नीति पर पत्रकारिय लेखन आपकी दख़लअंदाज़ी क्यों ? प्रिंट मीडिया के लिए भाषा और शाली की ज़रूरत है। लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि किसी बड़े विद्वान पंडित या साहित्यकार को संपादक बना दें। हिंदी में अक़्सर लोग शिकायत करते हैं कि पत्रकारिता में साहित्य को तरज़ीह नहीं दी जाती। आप बताइए कि संसार किस भाषा की पत्रकारिता में साहित्यिक ख़बरें प्रमुख रहती हैं। ख़बरों में बने रहने की ईच्छा वैसी ही वासना है , जैसा कि राजनेता पाले रखते हैं। मैंने देरिदा को नहीं दिखाया। आप ये न समझें कि ऐसा मैंने बाज़ार के दबाव में आकर किया। जी नहीं, मैंने यानी को भी नहीं दिखाया। ऐसा इसलिए कि आज तक के दर्शक समुदाय के लिए इन घटनाओं का कोई ख़ास महत्व नहीं है।

सवाल- ऐसा कह कर आप पत्रकारिता के लिए साहित्य के महत्व को रद्द तो नहीं कर रहे हैं? क्या आप रघुवीर सहाय, अज्ञेय, धर्मवीर भारती, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, श्रीकांत वर्मा और अन्य अनेक साहित्यकारों के पत्रकारीय योगदानों को स्वीकार नहीं करते ?जवाबः देखिए, एक बात साफ कर दूं कि मैं इन लोगों के प्रति बहुत श्रद्धा रखता हूं। साहित्य पढ़ना मेरी आदत है। जो लोग कविता लिखते हैं, वो बहुत कठिन और बड़ा काम करते हैं। मुझे ख़ुद इस बात का अफ़सोस रहता है कि मैं कविताएं नहीं लिख पाता। ये मेरी असमर्थता है। लेकिन ये लोग सिर्फ अच्छे साहित्यकार होने की वजह से संपादक नहीं बने। ये लोग अपने समय के श्रेष्ठ पत्रकार थे। ये उस दौर में सामने आए, जब जब हिंदी पत्रकारिता दोयम दर्ज़े के हाथों में था। इन लोगों ने इसे नया चमकदार चेहरा दिया।

साहित्य सृजन की एक श्रेष्ठ विद्या है। जैसे चित्रकला, अभिनय, गायन, नृत्य़ आदि। फिर आप बहुच बड़े डॉक्टर , इंजीनियर, नेता, वकील या कुछ भी हों पर इसका मतलब ये नहीं कि आपको संपादक बना दिया जाए। महज़ इसलिए कि आप उस भाषा में लिखते हैं, जिसमें अख़बार निकलता है।

एस.पी, सिंह का ये आख़िरी इंटरव्यू है। 16 जून 1996 को उन्हे ब्रेन हेमरेज हुआ था। जनसत्ता का ये अंक रविवार 15 जून 1996 को आया था। उस दिन मेरे छोटे बाई का जन्मदिन था। उस दिन मैंने अपने पापा से इस ख़बर को लेकर शैलेश जी के सामने मज़ाक भी किया था। लेकिन मुझे अहसास नहीं था कि क़ुदरत मेरे साथ ऐसा मज़ाक करेगी। मैं बग़ैर बरगद की छांव में बारिश में भीग रहा होऊंगा।

एस पी की याद में



Just about a week ago, an hour-and-a-half of nirgun bhajans at a quiet function in the Capital marked the passage of two year since Surendra Pratap Singh was removed from the midst of his family and friends by a cerebral stroke. At the India International Centre(IIC), people driven by diverse persuasions and with varying backgrounds gathered, drawn by a common chord that SP Singh represented to all of them.
As always, time has flown. The last two years have been consumed in a particularly inordinate, and chaotic, hurry. The media, which SP Singh first as a print journalist and later as the brain behind Aaj Tak, impacted in a decisive fashion, has had its hands full. It has been full time, demanding job to report, comment and analyse events that are even now shaping India of the next millennium.
Pictures and words struggle to capture the defining moments of the nation’s pell mell entry into the 21st Century. The formation of a saffron-led Government at the Centre, the momentous Pokhran-II nuclear tests, the life on the edge experience of the Vajpayee regime, Jayalalitha Jayaram’s tea party, Congress under Sonia and the sight of wagon loads of young troops heading for the icy inclines of Kargil.
Even as the nation awaits the final outcome of the border clash with Pakistan, the media is playing an exceptional role, bringing back pictures from very near the actual front, clips of air operations and of poignant funerals in villages that dot the countryside. Reporters have bunkered at forward base camps, telegraphing details of ongoing operations gleaned from men trickling back after fierce fire fights at 16,000 feet.
SP Singh would have plunged head long into the challenge of reporting events which are certain to have the effect of depth charges on India’s self-image as a nation. He was among the few top notch journalistic brains who had the capacity to quickly grasp the wider implications of an emerging situation while others were still grapping at the peripheries. This is perhaps why he could bring to Aaj Tak a degree of depth in perspective not usually seen on TV newscasts.
One of the reasons that SP Singh could focus his remarkable skills with telling results was because he did not let any form of dogma get in the way of a clear headed understanding of events. He demonstrated that the newsperson’s first credo is to approach information in a neutral, searching manner, rather than to move around news which fits that.
As one ponders the many lessons that SP Singh taught us, it is difficult not to take into account a growing sense of intolerance in our public debates and a parallel polarization within the media- both print and television. The pace of political developments has been frenetic, leaving little scope for considered comment.
Hustled in part by the electronic age, the need of the hour is encapsulated in an instant wisdom. It would seem that the demand for information requires quick gratification.
As the political and social structures are subjected to frequent fractures imposed by coalition governments, and crisis as wide in scope as Kargil implode on the nation’s consciousness, there is an accompanying " compulsion" to adopt "positions". Without a minute to lose, the era of competition dictates that all answers must be served neatly packaged and with a handy guide to boot.
The contentious issues remain the "secular communal" divide, the stability of coalitions, the relevance of caste- based parties, the renewed dynastic leadership of the Congress, even as some old debates have either lost their sting, or have taken a new shape. The growing irrelevance of old-style welfarism as represented in the past by NTR’s "two rupees rice" scheme is an example.
It is in these times that the cool, slightly cynical, partly sardonic journalism that SP Singh excelled in has become rather necessary. Not that his art was detached and bloodless. There was a fierce intensity to his pursuit of news and its inner connotations. There was nothing laidback about that manner in which he sharpened his words- in print or on TV . just a few sentences were enough to sketch a sharply defined canvas.
What was always an extraordinary aspect of SP Singh’s skills as a communicator was his ability to tightly control his reactions to events around him. Often his leashed sentences would have a much more telling effect than any outburst would have. To those who worked with him, learnt the value of honing and chipping a news report into a missile. The professional that he was, SP Singh would stress that what mattered in the end was how you told the story.
Over the past two years, memories of SP Singh have come and gone, often at the most unexpected moments. Sometimes while driving, or when on a touring to an area that he had described, trying to make sense of what the fragmented Mandal family was up to or even remembrance of a tale that he had related triggered by an odd word or gesture.
To many of those who worked with him, SP Singh was a oasis where one could put down for a while professional and personal worries. He keenly understood people, in fact this was his passion, never cloistered, he loved meeting people and talking about a range of subjects. It was always a bit of a surprise to see the erudition that he could drum up.
His knack for dealing with people saw him recognize when a colleague needed a leg up. In his own quiet as SP Singh would help restore confidence in a junior who could be finding the going tough. In a similar fashion, he could turn an inquiring mind onto a profitable path.
Every now and then, he would use humour to gently correct a colleague who could be getting his news copy just a bit wrong.
Efforts of SP Singh’s friends to put together a more concrete manner of commemoration such as an annual lecture or seminars is most welcome. It could be a small way to return the bounty that he gave those who lives he touched.
राजीव देशपाण्डेय ने पायोनियर में ये लेख लिखा था .

निजी टीवी चैनलों का भविष्‍य बेहतर है

यह लेख सुरेंद्र प्रताप सिंह ने अपने इंतकाल से थोड़े दिनों पहले लिखा था। अभी प्रथम प्रवक्‍ता की पीडीएफ कॉपी मोहल्ला को जुगनू शारदेय जी ने भेजी थी, जिसमें यह लेख था। इस लेख से अंदाज़ा होता है कि टीवी चैनल में अपनी उपस्थिति को लेकर एसपी कितने सचेत और सुनियोजित थे। एक ख़ास बात जो इस लेख में डिस्‍कस्‍ड है, वो ये कि 1995 के आसपास हिंदी न्‍यूज़ चैनल का कोई चरित्र नहीं बन पाया था। कमोबेश यही स्थिति आज भी है। 10-12 साल तक एक माध्‍यम चरित्र के मामले में अनगढ़ ही है, लेकिन धंधे में हो रही बरक्‍कत को अगर टीवी चैनलों की सफलता माना जाए, तो हम मान सकते हैं एसपी चैनलों का भविष्‍य देखने के मामले में दूरंदेशी थे।
निजी चैनलों का भारत में भविष्य कैसा है? पत्रकारिता की शैली में यदि आप मुझसे यह प्रश्‍न पूछें तो मैं कहूंगा कि भविष्य उज्ज्वल है। लेकिन इससे काम चलेगा नहीं। दूरदर्शन को एक तरह की चुनौती मिलनी शुरू हुई है और कई तरह के चैनल हमारे सामने आ रहे हैं। इन नये चैनलों में भारतीय, विदेशी, निजी और सरकारी चैनल शामिल हैं, लेकिन इन चैनलों की गहराई में यदि उतरें, तो ऐसा लगता है कि भविष्य जितना उज्ज्वल लगता है उतना है नहीं। चैनल आते हैं, थोड़े दिनों तक दिखाई देते हैं, ग़ायब हो जाते हैं। स्थायी भाव से दिखने वाले चैनलों में उत्तर भारत में जो हैं, मर्डोक के स्टार नेटवर्क के चैनल हैं। इनके अतिरिक्त दूसरे वे चैनल हैं जो जी और स्टार के चैनलों की नकल हैं। वे उसी की तरह का स्वांग करते हुए बाजार में आ रहे हैं। सोनी टीवी जी की नकल कर रहा है। एटीएन है, लेकिन वह पूरी तरह फिल्मों पर ही आधारित है। नया होम टीवी शुरू हुआ है। कुछ इलाकों में आ रहा है, कुछ में नहीं आ रहा। कुल मिला कर स्थिति जो बन रही है, सरसरी तौर पर देखा जाए तो निजी चैनल जितने आये हैं, उनमें सफलता का प्रतिशत ज्यादा नहीं है। फिर भी मैं यह जोखिम लेकर कहना चाहता हूं कि निजी चैनलों का भविष्य उज्ज्वल है।

मैं समझता हूं कि व्यावसायिक कोण के बिना किसी चैनल की सफलता या असफलता को आंकना आज के जमाने में नामुमकिन है। प्रिंट मीडिया जैसी स्थिति नहीं रही, जहां आप छोटी से छोटी पूंजी को लेकर एक विचारधारा के सहारे, अपनी पत्रिका निकाल लें। यह ऐसा माध्‍यम है, जिसमें करोड़ों की पूंजी लगती है। सिर्फ अच्छे कार्यक्रमों के आधार पर किसी चैनल की सफलता को नहीं आंका जा सकता, क्योंकि अगर ऐसा होता तो इस देश में `डिस्कवरी´ एक बहुत सफल चैनल हो गया होता।

जिस आधार पर मैं कह रहा हूं कि निजी चैनलों का भविष्य उज्ज्वल दिखाई देता है, उसके लिए मेरे पास दो आंकड़े हैं। एक आंकड़ा है कि 1985 में विज्ञापनों पर कितना पैसा खर्च किया जाता था और दूसरा आंकड़ा 1994 का है कि विज्ञापनों पर अब कितना पैसा खर्च किया जा रहा है। वर्ष 1985 में विज्ञापनों पर 15 अरब रुपए खर्च किये गये। इनमें से 75 प्रतिशत प्रिंट मीडिया पर खर्च होता था। 12 प्रतिशत रेडियो पर, 3 प्रतिशत सिनेमा पर और शेष 6 प्रतिशत आउटडोर, यानी होर्डिंग आदि पर। लेकिन वर्ष 1994 में विज्ञापनों पर खर्च होने वाली कुल राशि 1.5 से बढ़कर 35 अरब हो गयी, यानी 10 साल में 400 प्रतिशत से भी ज्यादा की बढ़ोत्तरी हुई। लेकिन प्रिंट मीडिया का हिस्सा 75 से घट कर 62 पर आ गया। टेरिस्ट्रियल टीवी, यानी दूरदर्शन, तब भी 12 वें स्थान पर था और अब भी वहीं डटा हुआ है। कुल विज्ञापन राशि का 6 प्रतिशत हिस्सा सैटेलाइट टेलीविजन के पास गया है। रेडियो घट कर 6 प्रतिशत पर आ गया है। चिंता की बात है कि इस गरीब देश में, जहां पर रेडियो की पहुंच सबसे ज्यादा है, उस पर विज्ञापनों में कमी आयी है। रेडियो से भी ज्यादा दयनीय स्थिति सिनेमा की है। उसका पहले का 3 प्रतिशत हिस्सा घट कर लगभग शून्य पर आ गया है। इन आंकड़ों से मुझे निश्‍िचत रूप से यह लगता है कि इस देश में निजी चैनलों का भविष्य उज्ज्वल है।

पर निजी चैनल हैं क्या? निजी चैनल हमारे यहां दो-तीन तरह के हैं। एक वह सॉफ्टवेयर प्रोड्यूसर जो दूरदर्शन के चैनल पर काम कर रहे हैं। दूरदर्शन के नियम मानते हैं। उसके नियम मानते हुए अपने प्रोग्राम बनाते हैं, अपना विज्ञापन लाते हैं और उस विज्ञापन में शेयर बांटते हैं। दूसरे वे लोग हैं जो चैनल चला रहे हैं। भारतीय चैनल चलाने वाले भी हैं और विदेशी चैनल चलाने वाले भी। पर इनमें कौन कितना भारतीय है कौन कितना विदेशी है - यह साफ नहीं समझ आता। जी भारतीय है और स्टार विदेशी है। जी में लगभग 49.9 प्रतिशत मर्डोक है और 50.1 प्रतिशत जी। होम टेलीविजन शुरू हुआ है, जिसमें 20 प्रतिशत ही शायद हिंदुस्तान टाइम्स का है और बाकी 80 प्रतिशत में चार बड़ी-बड़ी कंपनियों की हिस्सेदारी है। इसे हम भारतीय मानें या न मानें, यह भी अपने आप में विवाद का विषय है।

हम अगर हिंदी मीडिया से बाहर निकल कर उत्तर से दक्षिण भारत पर नजर डालें, तो हमारा दिमाग साफ हो जाएगा कि किस पैमाने पर वहां निजी चैनल सफलतापूर्वक चल रहे हैं। वहां पर चार चैनल तो बड़े सफल साबित हो रहे हैं। इनमें सन, जेमिनी, राज और जेजे शामिल हैं। जी हिंदी का सबसे सफल चैनल है, लेकिन उस पर भी लोकप्रियता की दृष्टि से सबसे ज्यादा देखे जाने वाले कार्यक्रम क्लोज अप अंताक्षरी, फिलिप्स टॉप टेन और कैंपस हैं, जिनकी टीआरपी रेटिंग 10 के आस-पास रहती है। इससे ऊपर नहीं जा पाती। दूरदर्शन की रेटिंग बहुत ऊंची है।

जब महाभारत अपने पूरे उफान पर होता है, तो 60-62 पर चलता है। कृष्णा है। 50-52 से नीचे कहीं नहीं रहता। `आपकी अदालत´, जो एक तरह से टेलीविजन पत्रकारिता में एक प्रतिमान कायम कर रहा है, वह भी लोकप्रियता में दो प्रतिशत से ऊपर नहीं पहुंच पाता। दूसरी तरफ आप देखिए तमिल के जो चैनल हैं और वहां पर उनके जो समाचार आते हैं, उन्हें देखने वालों का प्रतिशत 40 से 70 तक पहुंच जाता है। यह सिर्फ तमिल में ही नहीं होता, तेलुगु में भी होता है और मलयालम में भी। जयललिता की पराजय में बहुत बड़ी भूमिका सन टीवी की रही। अंतिम दिनों में वहां पर रजनीकांत ने जो अपना बयान दिया, उसका असर यह हुआ है कि जयललिता की पार्टी तमिलनाडु में पूरी तरह से साफ हो गई। तो इतनी प्रभावशाली भूमिका में दक्षिण भारत के चैनल अभी काम कर रहे हैं। आर्थिक रूप से भी वे इतने सक्षम हो गये हैं कि दावे के साथ भारत सरकार के सामने कह रहे हैं कि आप हमें अपलिंकिंग की सुविधा दीजिए, हम सारा इंतजाम खुद करेंगे।

दक्षिण के चैनलों की तरह की स्थिति हिंदी के चैनलों की नहीं बन पा रही है। लेकिन स्थिति कोई बहुत ज्‍यादा बुरी भी नहीं है कि हम यह मान लें कि उनका भविष्य इस देश में उज्ज्वल नहीं है। यह स्थिति क्यों नहीं बन पा रही है, इसका मुख्य कारण है कि अभी तक हिंदी के चैनलों का कोई चरित्र नहीं बन पाया है। सिर्फ सिनेमा के क्लिप लेकर और एक लड़का और लड़की को ले लें और वह तरह-तरह से उछलता रहे, कभी सड़क पर कभी चिड़‍ियाघर में; इस तरह के 20 प्रोग्राम आप हम पर झोंक दें और उम्मीद करें कि वह सफल हो जाएंगे। नहीं होंगे। हर तरह के प्रोग्रामों की एक सीमा होती है और अभी जो स्थिति है कि हम लोग परीक्षण के दौर से गुज़र रहे हैं कि जो चीज सफल हो गयी तो उस पर भेड़चाल से टूट पड़ते हैं। यानी एक अंताक्षरी सफल है तो आप सौ अंताक्षरियों के लिए तैयार हो जाइए। या एक काउंटडाउन सफल हो गया है, तो सौ तरह से काउंटडाउन आपके पास आने वाले हैं। हमारा बौद्ध‍िक दिवालियापन इस हद तक है। अगर एक हनुमान चल रहे हैं, तो अब दूसरे भी आ गये हैं। और मैं दावे के साथ कह रहा हूं कि अब तीसरे हनुमान भी आने वाले हैं। यह सिर्फ निजी चैनलों की बात नहीं है। हमारा जो दूरदर्शन है, वहां पर भी कल्पनाशीलता का घोर अभाव है। आज उनकी सबसे बड़ी चिंता यह है कि टीआरपी रेटिंग कैसी है। हमारे देश में अशिक्षितों की संख्या सबसे ज्यादा है। टीवी 44 प्रतिशत निरक्षर लोगों के घरों तक पहुंचता है। पश्‍िचम में सैटेलाइट या इलेक्टॉनिक मीडिया का जब हमला हुआ तो कमोबेश उस समाज में शिक्षा का एक स्तर पहुंच चुका था, जहां लोग कम से कम 90 प्रतिशत और कहीं-कहीं शत-प्रतिशत साक्षर थे। वहां पर जब इसका हमला हुआ, तो इसकी जो बुराइयां थीं वे उनको झेल गये। हमारा देश तो वैसे भी वाचिक परंपरा का देश रहा है। हम लिखने पर विश्‍वास कम करते हैं और बोलने में ज्यादा। हमारे ज्यादातर महाकाव्य बोल कर लिखे गये। ऐसे देश में, जो बीच का स्थान था उसे हम फलांग कर आगे निकल गये। अशिक्षित लोगों के पास अब हम इतने सशक्त माध्‍यम को लेकर जा रहे हैं जो दृश्‍य भी है और श्रव्य भी। किस हद तक यह माध्‍यम उनको प्रभावित कर सकता है, जरा इसके बारे में सोचें और इसके ख़तरे के बारे में विचार करें। इस माध्‍यम का अच्छा उपयोग करें, तो अच्छी बात होगी। लेकिन उपयोग यदि बुरा हुआ तो स्थिति बहुत गंभीर हो जाएगी।

मैं सरकार में नौकरशाही और राजनीतिज्ञों को अलग-अलग करके देखता हूं। इसमें नौकरशाही की भूमिका यह है कि इसने यह समझ लिया है कि इस देश के ज्यादातर लोग गैरजिम्मेदार हैं। हमारा दो प्रतिशत अंग्रेजी बोलने वाला- चेटरिंग क्लास है, उसको लोकतंत्र से ही चिढ़ होती जा रही है। लोग फूलन देवी को चुन कर भेज देते हैं। मुलायम सिंह जीत कर आ जाते हैं। देवगौड़ा को प्रधानमंत्री बना देते हैं। इनकी राय है कि ये तो गैरजिम्मेदार लोग हैं। किसी को भी चुन लेते हैं, कोई भी आकर बैठ जाता है। यह जो देश है, यह जो ढांचा है, यह जो स्टीलफ्रेम हमको अंग्रेजों ने सौंपा था, इसको बनाये रखने की पूरी जिम्मेदारी हमारी है। नौकरशाही अपने बहुत सारे तर्क देती रहती है। सबसे बड़ा तर्क तो यह है कि देश की सुरक्षा पर ख़तरा है। सुरक्षा पर क्या खतरा है? दूरदर्शन और आकाशवाणी मुक्त हो जाएं, तो देश की सुरक्षा पर खतरा है। कश्‍मीर का मामला है, पंजाब का मामला है, आदि आदि। हम लोग यह जोखिम नहीं ले सकते। हमारी संस्कृति पर खतरा है। इसलिए हम निजी चैनलों को अपलिंकिंग की सुविधा नहीं देंगे।

हम लोग जो समाचार दे रहे हैं, वह सारा झूठ दे रहे हैं। इसकी हमको कोई चिंता नहीं है। हम जो मनोरंजन दे रहे हैं, वह तीसरे दर्जे से भी घटिया किस्म का है। कहीं कोई कल्पनाशीलता नहीं है। कहीं कोई सामाजिक सरोकार नहीं है। दरअसल, कुछ अखबार वाले आतंकित हैं कि विदेशी आकर हमारा एकाधिकार समाप्त कर देंगे। वे इस तरह का हौआ खड़ा कर रहे हैं। कुछ ऐसे राजनयिक और कुछ ऐसे नौकरशाह हैं, जो सत्ता में रह कर इस माध्‍यम का अपने हित में इस्तेमाल करना चाहते हैं। मैं समझता हूं कि यह तभी ठीक हो पाएगा जब निजी चैनल भारतीय प्रतिभा के द्वारा संचालित होंगे, जो भारतीय नियमों से चलेंगे और भारतीय जमीन से जिनका जुड़ाव बौद्धिक स्तर पर होगा, तभी इन परिस्थितियों में सुधार आएगा।

Monday, April 14, 2008

आधे सफर की अधूरी कहानी

सुरेंद्रप्रताप सिंह की यादें (10वीं पुण्यतिथि)
- दीपक चौरसिया
दोपहर का वक्त था। जून की तपती दोपहरी में मैं छुट्टी पर अपने गृहनगर सेंधवा में, जो कि मध्यप्रदेश में महाराष्ट्र की बार्डर पर है, 'नईदुनिया' के पन्ने पलट रहा था। तभी एकाएक फोन की घंटी बजी। फोन मैंने उठाया। फोन एनडीटीवी से था। मेरी दोस्त माया मीरचंदानी लाइन पर थीं। उन्होंने मुझसे कहा 'एसपी' (प्यार से सब उन्हें यही कहा करते थे) बहुत बीमार हैं, अपोलो में भर्ती हैं। मुझे विश्वास नहीं हुआ। फोन पर दूसरी तरफ मुझे फिर आवाज सुनाई दी मेरी होने वाली पत्नी अनुसूइया थी। 'दीपक मैं तुम्हे बताना चाहती थी, लेकिन पता नहीं तुम कैसे रिएक्ट करोगे।' मैं कुछ नहीं बोल पाया, फोन रख दिया।पहली बस और इंदौर की ओर मैं रवाना हो गया, लेकिन 'एसपी बॉस' के साथ बिताया हर एक लम्हा याद आने लगा। 'इंदौर होलकर साइंस कॉलेज थ्रू आउट फर्स्ट क्लास फर्स्ट' अरे कोई अच्छी नौकरी करो, क्यों झोलाछाप हिन्दी पत्रकारिता में आना चाहते हो। इंदौर से पहली बार जब इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मॉस कम्युनिकेशन का इंटरव्यू देने गया तो बोर्ड में वही थे। मेरा जवाब था 'मुझे लगता है मेरे जैसे लोगों के लिए आगे की पत्रकारिता में जगह होगी।' इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मॉस कम्युनिकेशन से निकलने के बाद पहली नौकरी दिल्ली की इंडियन न्यूज पेपर सोसाइटी की बि‍ल्डिंग में लगी। 'बॉस' उस वक्त टेलीग्राफ के राजनीतिक संपादक थे। हफ्ते में दो-तीन भेंट होती थी। पूरी रिपोर्ट लेते थे। बीजेपी ब्रीफिंग में क्या हुआ? कांग्रेस में क्या हुआ? 'नईदुनिया' से भी 'बॉस' का नाता लंबा था। बिला नागा वे क्षेत्रीय अखबार दो घंटे पढ़ते थे। नईदुनिया इकलौता अखबार था जिसे शायद ही मिस करते। एक बार का वाकया मुझे अच्छी तरह याद है।
जो एक बात वे गाँठ बाँधकर रखने को कहते थे कि कभी एकतरफा स्टोरी मत करो, दोनों पक्षों का होना बेहद जरूरी है। घंटों की मेहनत से लिखी स्क्रिप्ट को वे पाँच मिनट से कम में इतना छोटा और बेहतर कर देते कि कभी-कभी लगता कि उनकी कलम या फिर सरस्वती का वरदान।
हमारी एक सहयोगी सिक्ता देव के पिता मध्यप्रदेश केडर के आईपीएस अधिकारी थे। उस दिन सुबह उन्होंने सिक्ता को बताया कि तुम्हारे पिता की नई पोस्टिंग हो गई है। यही खबर मैं सिक्ता को दे चुका था। उन्होंने सिक्ता से पूछा तुम्हें पता था, तुम्हें किसने बताया। उसने मेरा नाम लिया। 'बॉस' मुस्कुराए। बाद में मुझे बुलाया और कहा कि अगर सरकार में क्या हो रहा है, इस पर नजर रखनी है तो पहली बात गाँठ बाँध लो नौकरशाही के मूवमेंट को बहुत बारीकी से वॉच करो। उन्हीं के मार्गदर्शन ने सिखाया कि इस देश में तीन लोगों की चलती है पीएम, सीएम और डीएम। वे सचमुच के 'बॉस' थे। कितनी भी बड़ी गलती कर दो, उन्हें बता दो एक सीख मिलती। लेकिन कभी मूड नहीं बिगड़ता। मैंने एक बार राष्ट्रपति भवन में खेल पुरस्कार लेने वालों की स्टोरी में एक ऐसे खिलाड़ी का नाम डाल दिया जो वहाँ मौजूद नहीं था। रात भर सो नहीं पाया। सुबह उठा। बिना नहाए धोए सबसे पहले जाकर उन्हें बताया। सीख मिली। बंदूक से निकली गोली और लाइव टीवी में मुँह से निकला शब्द कभी वापस नहीं आता। जाओ आज का काम करो। उन शब्दों में डाँट भी थी, नसीहत भी, प्यार भी और प्रोटेक्शन भी। यही उनकी महानता थी। जो एक बात वे गाँठ बाँधकर रखने को कहते थे कि कभी एकतरफा स्टोरी मत करो, दोनों पक्षों का होना बेहद जरूरी है। घंटों की मेहनत से लिखी स्क्रिप्ट को वे पाँच मिनट से कम में इतना छोटा और बेहतर कर देते कि कभी-कभी लगता कि उनकी कलम या फिर सरस्वती का वरदान। एक बार मैं समाज कल्याण मंत्रालय की कुछ योजनाओं पर एक क्रिटिकल विश्लेषण कर रहा था। सीताराम केसरीजी उस विभाग के मंत्री थे। 'बॉस' के बेहद नजदीकी जानने वाले। एक स्टेटमेंट के लिए दिनभर वे मुझे दौड़ाते रहे। शाम को थक-हारकर मैं 'बॉस' के पास पहुँचा। उन्होंने 'केसरीजी' से बात की, शायद वे स्टोरी नहीं चलाने देना चाहते थे। जब वे फोन पर बात कर रहे थे, तब उनके चेहरे पर आते-जाते भाव मुझे अब भी याद हैं।उन्होंने कहा- स्टोरी चलाओ यह कहो कि मंत्रीजी ने प्रतिक्रिया देने से मना कर दिया। जाते-जाते उन्होंने मुझसे कहा 'घोड़ा घास से यारी करेगा तो खाएगा क्या?' शायद पत्रकार और नेता के रिश्तों के बावजूद पत्रकार की कलम पर ब्रेक न लगाना उनके आदर्शों की कहानी बयाँ करता है। सोचता हूँ आज एसपी होते तो क्या होता। हिन्दी टीवी पत्रकारिता का आयाम दूसरा होता। लेकिन आज भी जब वे ऊपर से देखते होंगे तो नकवी दादा, दिबांग पुगालिया, अलका सक्सेना, आशुतोष और अपनी पूरी टीम को टीवी पत्रकारिता पर राज करते देख फख्रमहसूस करते होंगे। (लेखक 'आज तक' के कार्यकारी संपादक हैं)

When Hindi became telegenic

YOGENDRA YADAV
Wednesday, June 27, 2007 at 0000 hrs
Hindi news TV would not have been where it is today, but for Surendra Pratap Singh or ‘SP’, who died ten years ago. But he would not have recognised what passes for Hindi TV news today
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I think of ‘SP’ every time I face the question: “Are you the same man that appears on Aaj Tak?” I continue to face this question hundreds of times, years after my formal association with Aaj Tak is over. Not surprising, for Aaj Tak was for Hindi television news what Surf was for detergents or Xerox for photocopiers.
I think of him whenever anyone’s Hindi credentials are mentioned with some respect in Delhi’s charmed circles. Not so long ago, it was not enough to know English; it was equally important not to know any other Indian language. Failing in Hindi was a mark of honour. Being at ease with a desi language defined you out of the monolingual English-speaking power elite. This power equation has altered a bit in the last decade or so. Your station in life is still determined by how well you speak English, but knowing Hindi is no more a disqualification.
If we can credit one person with this shift, it must be Surendra Pratap Singh. ‘SP’ launched Aaj Tak, initially as a half an hour news bulletin on Doordarshan, and took it to its iconic status. Today everyone knows that the viewership of all the English news channels put together is but a small proportion of the Hindi viewership. For every big media house, their Hindi channel is the real money spinner. It appears quite logical, if you compare the number of English and Hindi speakers. But only ten years ago it was not so obvious. Hindi media was a distant and very poor cousin to the all-powerful English media.
SP set out to change this by adopting a fresh and bold approach. He broke ranks with the many devotees, servants and fanatics of Hindi. Instead of worshipping Hindi, he worked with it. He worked out a simple yet crisp Hindi for television, distinct from the stuffy language of the print media, without giving in to the pressures of Hinglish. He recognised that Hindi was not an endangered species waiting to be rescued by the faithful. Unlike his contemporaries who had a contempt for or fear of the market, SP built on the huge market potential of Hindi — his confident Hindi did not need to be fanatic. He was perhaps the only Hindi journalist whose column was translated into English and carried by The Economic Times.
SP instilled professionalism in Hindi journalism. I was sitting by him when he received a call from a very powerful chief minister, complaining against an adverse personal report in the bulletin the day before. SP calmly replied that he was planning to use the story again that evening. And sure he did. When all of north India was celebrating Lord Ganesha’s milk drinking feat, SP got a scientist to explain surface tension in the evening bulletin. He dragged me into television, after reading my articles in the Economic and Political Weekly, for he thought Hindi media needed election experts.
Yet his professionalism was not apolitical. A man of deep political convictions and a political animal to the core, SP held his own against the communal wave that threatened to drown the Hindi media. Unabashedly pro-Mandal, he translated his conviction by recruiting and training a large number of non-upper caste Hindu journalists.
The day I heard about the sudden announcement of Pratibha Patil’s candidature, I surfed all the Hindi channels for more news about her. Her candidature was not important news for any of the prime-time bulletins. One leading channel had a special programme on how Rampur ka nawab was caught distributing sewing machines. There was a promo for a special programme on wife swapping. My mother shared my frustration: “ab to khabar ki channel par bhi khabar nahin dikhate”. I thought of SP once again and wondered if Hindi television would still show all this if he was still around?
The writer is a political scientist at CSDS, New Delhi

बात एसपी-डीएम की, न्यूज़ चैनलों की

अनिल
यहां एसपी का मतलब आजतक की शुरुआत करनेवाले सुरेद्र प्रताप सिंह से है और डीएम का मतलब आजतक से स्टार न्यूज़ होते हुए सीएनबीसी आवाज़ तक पहुंचे दिलीप मंडल से है जिनकी राय में, ‘ये कहना तथ्यों से परे है कि कभी पत्रकारिता का कोई स्वर्ण युग था या कि पहले कोई महान पत्रकारिता हुआ करती थी।’ वैसे, मंडल जी पर एसपी का प्रभाव इतना ज्यादा है कि उनकी वेशभूषा, चेहरे-मोहरे और हाव-भाव से एसपी की छाया-सी छलकती है। उनके लिखने से भी यह ज़ाहिर हो जाता है। तभी तो वे कहते हैं, ‘पुराने एसपी से नए जमाने के पत्रकार बहुत कुछ सीख सकते हैं। लेकिन एसपी जितने मॉडर्न थे, उस समय की पत्रकारिता उतनी मॉडर्न नहीं थी।’मंडल जी की यही बात मेरे गले नहीं उतरती। पेड़ बड़ा मॉडर्न था, जंगल उतना मॉडर्न नहीं था। जंगल से पेड़ अलग, पेड़ से जंगल अलग। हकीकत ये है कि आज हिंदी न्यूज़ चैनलों में जो भी अच्छाई या बुराई है, उसके बीज एसपी सिंह की कार्यशैली में ही छिपे हैं। वैसे भी, आज की हिंदी टेलिविजन पत्रकारिता में एसपी के ही तो चेले-चापड़ हर जगह विराजमान हैं।सच कहें तो एसपी आज एक कल्ट बन चुके हैं। समाचार चैनलों के संपादक उनके फोटो सजाते हैं। पाल, प्रकाश, प्रसाद, प्रताप जैसे मध्य नामों वाले खुद को एपी, एनपी, केपी, जीपी, सीपी जैसा कुछ कहलाना पसंद करते हैं। एसपी के पत्रकार भाई सत्येंद्र खुद को एसपी ही कहलवाते हैं। बहरहाल-हालांकि का फेंटा लगाने वाले ‘सर्वश्रेष्ठ’ चैनल के ‘सर्वश्रेष्ठ’ राजनीतिक एंकर डेस्क वालों पर रौब जमाते हैं कि एसपी होते तो ऐसी कॉपी उठाकर फेंक देते हैं। हर तरफ एसपी की तारीफों के पुल बांधे जाते हैं। अर्ध-पत्रकार समाज विश्लेषक भी, एसपी होते तो क्या होता, की बात सोचते-गुनते रहते हैं।मेरा एसपी के साथ कोई सीधा ताल्लुक नहीं रहा है। टाइम्स रिसर्च फाउंडेशन में क्रैश कोर्स के दौरान उन्होंने इंटरव्यू लिया था और क्रैश कोर्स बीच में छोड़ने पर उन्होंने रोका था। लेकिन रविवार से लेकर नवभारत टाइम्स और आजतक में उनके साथ काम करनेवाले कुछ लोगों ने जो मुझे बताया, उसके मुताबिक एसपी का टीम बनाने में कोई यकीन नहीं था। वे जब जिसे चाहा, चढ़ाते थे और उतनी ही निर्ममता से गिरा भी देते थे। टीम न बनने देने की उनकी फितरत उनके चेलों में निरंतर बह रही है।यही वजह है कि हमारे हिंदी चैनलों के संपादक गुट बनाने में उस्ताद है, जबकि टीम के बनते ही उनको अपनी अक्षुण्ण सत्ता के खंडित होने का डर सताने लगता है। फिर इन संपादकों के इर्दगिर्द बन जाता है बौद्धिक काहिली और शातिर दुनियादारी से ग्रस्त चालाक चेलों का मंडल, जिनको इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि नीचे के लोग क्या सोच रहे हैं, साथी पत्रकार क्या सोच रहे हैं, दर्शक क्या सोच रहे हैं। उनकी जवाबदेही सिर्फ ऊपरवालों की तरफ होती है। नीचे का कोई फीडबैक उनके लिए बेमानी होता है।ज़ाहिर है एसपी में इस तरह की खामियां नहीं रही होंगी। लेकिन खराब मशीन से निकली फोटोकॉपी में ओरिजनल की बस छाया भर होती है। हम ये भी जानते हैं कि इतिहास की छोटी-सी चूक वर्तमान तक आते-आते भयंकर भूल बन जाती है। एसपी के उत्तराधिकार का डंका बजानेवालों को ये बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए। अनुकृति के चक्कर में पड़ने के बजाय नई ज़मीन तलाशनी चाहिए। और, कुछ लोग ऐसा कर भी रहे हैं क्योंकि धरती कभी वीरों से सूनी नहीं होती।

ये प्रलाप क्यों ?

अशोक कुमार कौशिक
ये एसपी का नहीं टीआरपी का ज़माना हैवरिष्ठ पत्रकार सुरेन्द्र प्रताप सिंह यानी एसपी सिंह की पुन्यतिथी पर दो वरिष्ठ पत्रकारों के लेख अलग-अलग अखबारों में पढे। दोनों ही मौजूदा टीवी पत्रकारिता के दिग्गज। दोनों ही एसपी स्कूल ऑफ़ जर्न्लिस्म के स्नातक। दोनों ही लेखों में एक समान चिन्ता नज़र आई, वो ये टीवी पत्रकारिता अपने मूल्यों, सरोकारों और अपनी जिम्मेदारियों से पीछे हट रही है। दूसरे शब्दों में कहें तो ये टीवी पत्रकारिता के लिए नैतिक गिरावट का दौर है। अगर आज एसपी होते तो ये होता, एसपी होते तो वो होता। और एसपी होते तो ये नहीं होता, एसपी होते तो वो नहीं होता। लब्बोलुआब ये कि एसपी मौजूदा टीवी पत्रकारिता से कतई सन्तुष्ट नहीं होते। लेकिन दोनों लेख पढ़ने के बाद मेरे ज़हन में कुछ सवालों ने सहज ही सिर उठा लिया। मसलन- क्या गारंटी है कि एसपी होते तो बिना ड्राइवर की कार टीवी स्क्रीन पर दौड़ नहीं रही होती?- बदला लेने पर आमदा कोई नागिन(जिसे इछाधारी कहा जाता है ) टीवी कीtop story नहीं बनती ?- स्कूल में विद्यार्थियों की जगह भूत ना पढ़ रहे होते?- आये दिन टीवी पर आत्मा और परमात्मा के खेल ना चल रहे होते? विचलित कर देने वाले दृश्य यूँ धर्ल्ले से ना दिखते और ब्रेकिंग न्यूज़ के नाम पर ऊल-जुलूल खबरें ना परोसी जाती? हो सकता है कि एसपी के साथ काम कर चुके पत्रकारों को मेरे ये सवाल शूल की तरह चुभें. लेकिन ये सवाल पत्रकारिता के इन धुरंधरों के विवेक और aditorial जजमेंट की कसोती हैं. अगर वो कहेंगे कि हाँ-एसपी के ज़माने में ऐसा कभी नहीं हुआ- और वो होते तो eऐसा नहीं होता. तो फिर सवाल ये है कि अब ये सब क्यों हो रह है?? ज़्यादातर टीवी चैनलों की कमान एसपी की टीम में शामिल रहे पत्रकारों के हाथ है, फिर ये गिरावट क्यों जारी है?दूसरी तरफ अगर, ये लोग बदले हुए हालात कि दलील दे कर मौजूदा टीवी पत्रकारिता को सही ठहराने की कोशिश करें, तो फिर एक सवाल उठता है. वो ये कि- जब आप बदले हुए दौर कि दुहाई दे कर एसपी सिंह के आदर्शों की ही तिलांजलि दे चुके हैं, तो उन्हें याद करने के बहाने ये प्रलाप क्यों...??दरअसल मामला साफ है- एसपी सिंह ने लोगों से जुडे मुद्दे उठाये, बड़ी बेबाकी के साथ तल्ख़ से तल्ख़ टिपण्णी की और अपने बुलेटिन मे आस्था और अंधविश्वास का घालमेल नहीं किया. शायद इसीलिये उनका अंदाज़ कम समय में ही लोगों के दिल में बस गया. लेकिन ती-आर-पी कि ज़ंग में अब वो जज्बा हाशिये पर चला गया है. शायद इसलिये कि आज टॉप बॉस बने बैठे एसपी के साथी ख़ूब सम्झ्तें हैं कि ये एसपी का नहीं- ती-आर-पी का ज़माना है...

एस पी जिंदा होते तो आजतक देखकर मर जाते




संजय तिवारी
एस पी सिंह भारत में टेलीविजन पत्रकारिता के जनक थे. आधे घंटे के न्यूज बुलेटिन “आज तक” का उनका प्रयोग दस साल में सवा सौ करोड़ रूपये का खबर उद्योग हो गया है. उनकी पिछली पुण्यतिथि पर कई सारे चेलों ने अपने संस्मरण लिखे और कहा कि आज अगर एसपी होते तो क्या कहते? कुछ ने लिखा था कि समय के साथ बदलावों को सच्चाई मानकर सबकुछ स्वीकार कर लेते. कुछ ने कहा कि वे ऐसी लकीर खींच देते कि लोग इधर-उधर जाते ही नहीं. मैं कहता हूं, आज अगर एसपी जिंदा होते तो आजतक देखकर मर जाते.एस पी की अकाल मृत्यु को सही नहीं कहा जा सकता लेकिन क्या वे बर्दाश्त कर पाते कि उनके खून-पसीने से खड़ा हुआ एक समाचार माध्यम इतना पतित हो गया है कि खबरों के नाम पर नंगई और बेहूदगी परोस रहा है. और किसी चैनल की बात मत करिए. उनके अपने खड़े किये चैनल आजतक को ही देखिए. वह आधे घंटे का कार्यक्रम यह दिखाता है कि करीना कपूर के हाथ में एक अंगूठी है और सैफ अली खान उसे छोड़ने किसी पार्टी में जाते हैं. कैमरामैन पकड़ लेता है कि सैफ के हाथ पर करीना कपूर लिखा हुआ है. अब इस बात खबर बनाने के लिए वहां एक बेचारी टाईप रिपोर्टर खड़ी की जाती है. उससे फोन पर बात होती है और इन्पुट लिया जाता है.
आज तक का ऐसा घोर पतन देखकर बहुत दुख होता है. इतना पतन शायद किसी और चैनल का नहीं हुआ हो क्योंकि लोगों ने उस शीर्ष से शुरूआत ही नहीं की थी जिससे आजतक ने शुरू किया था. अनगिनत अंट-शंट बातों को दिखाकर क्या हम टीवी को मूर्खों का माध्यम बनाना चाहते हैं? और अगर यह सचमुच मूर्खों का माध्यम हुआ तो उसमें काम करनेवाले सीनियर-जूनियर क्या कहे जाएंगे? बुद्धिमान?
टीवीवालों ने खबरों की दशा बिगाड़कर रख दी है. इस इंडस्ट्री में काम करनेवाले शायद इस बात का अंदाजा नहीं लगा पा रहे हैं कि यहां समूहगत रूप से लोगों को मूर्ख नहीं बनाया जा सकता. देश की जनता हमारी आपकी समझ से ज्यादा समझदार है. जनता ने समय-समय पर इसे साबित भी किया है. ये करीना कपूर और भालू बंदर गाशिप हैं और उनके साथ वैसा ही व्यवहार करना चाहिए. अभी तो जनता मजा ले रही है लेकिन अगर आप यही सब खबर बनाते रहे तो धीरे-धीरे जनता आपका साथ छोड़ देगी. फिर जिसके साथ जनता नहीं विज्ञापनदाता उसका साथ क्यों होगा?
प्रस्तुतकर्ता अनुराग पुनेठा
टीवी पत्रकारिता का रसातल
टीवी पत्रकारिता देखिये, 'कहाँ' से 'कहाँ' पहुँच गयी है! स्वर्गीय एसपी सिंह ने जब 'आजतक' का आधे घंटे का न्यूज बुलेटिन शुरू किया था तह चन्द ही हफ्तों बाद देश के नेताओं का वही हाल हो गया था जो बीबीसी की सिगनेचर ट्यून सुनकर ब्रिटेन और अमेरिका के शीर्ष नेताओं का हुआ करता था. अंगरेजी समाचारों को अखंड सत्य मानने और जानने वाले धुरंधरों की धुकधुकी बढ़ जाती थी 'आजतक' की सिगनेचर ट्यून सुनने के बाद! और तो और मेरे साथ एक सांध्य दैनिक के दफ्तर में 'दिल का हाल कहे दिलवाला' गा-गाकर नाचनेवाला एक बन्दा जब एसपी 'आजतक' में चला गया था तो हम लोग उसे अमिताभ बच्चन की तरह देखने लगे थे.कट टू-आजतक चौबीस घंटे का हुआ. उसका कायापलट होना शुरू हो गया. समाचार की जगह गिमिक ने ले ली और उसमें वे सारी बुराइयां आती गयीं जो एक पैसे के पीछे भागने वाले चैनल की हो सकती हैं. एसपी जहाँ बिना बाईट के भी मर्मान्तक कैप्स्यूल तैयार कर लेते थे वहीं अब 'पान की पीक' और 'धूमिल' के शब्दों में कहें तो 'थीक है-थीक है' वाली बाइटें प्रचुर मात्रा में होने के बावजूद बेजान समाचार परोसे जाने लगे.दीगर चौबीस घंटे के समाचार चैनलों में तो जैसे भूत-प्रेत, अंधविश्वास, अपराध और हिंसा परोसने की होड़-सी लग गयी. स्त्री को कम कपड़ों में दिखाने के मामले में तमाम चैनल दुस्सासन और द्रौपदी प्रसंग साक्षात साकार करने लगे. ड्रामा देखने के लिए अब हिन्दी फिल्में देखने की आवश्यकता ही नहीं है. समाचार पर्याप्त नाटकीय हो चुके हैं. अच्छा हुआ जो एसपी चले गए. वरना अब के चैनल देखकर चले जाते. उनकी मृत्यु का एक कारण एक न्यूज कैप्स्यूल तैयार करने के बाद उनके मन में पैदा हुई बेचैनी को भी गिनाया जाता है. वह इतने संवेदनशील थे.कट टू- एक समाचार चैनल है. मुम्बई और महाराष्ट्र का हिन्दी चैनल है. एंकर महाशय पत्रकारिता के कालपुरूष हैं. उन्होंने 'डेली' टेबलोइड में जान फूंकी थी यह सभी जानते हैं. लेकिन यहाँ बैठकर वह सारा समाचार जगत ज्योतिषियों के दम पर चलाते हैं. दो ज्योतिषी उनके परमामेंट हैं. अब एक टैरो कार्ड रीडर भी जुड़ गयी है. उनकी टीवी पत्रकारिता का एक नमूना पेश है:-एंकर- पंडित जी आप बताएं, सचिन तेंदुलकर कितने साल अभी खेल सकेंगे?पंडितजी- सचिन का राहू केतु में, सूर्य धनु राशि में... ब्ला....ब्ला....ब्ला...एंकर- आपने इस चैनल पर पहली बार सुना है.. एकदम पहली बार... (अब दूसरे पंडित से) अच्छा आप बताइये क्या सरबजीत को पाक छोड़ देगा?पंडितजी- सरबजीत की कुंडली तो हमारे पास नहीं है लेकिन भारत और पाकिस्तान की कुंडली है. इससे लगता है कि पाक को छोड़ना पडेगा...एंकर- आपने इस चैनल पर पहली बार सुना है.. एकदम पहली बार... (अब टैरो कार्ड वाली से) आप बताएं अगली सरकार किसकी बनाती दिखती है?तीनों ज्योतिषी एक राय होकर कहते हैं- भाजपा की बनेगी.. क्योंकि सोनिया की कुंडली में अमुक दोष है और आडवाणी जी की कुंडली में फलां शुभ योग है... (यानी देश भर के तमाम ज्योतिषी भाजपा की सरकार बनते देखना चाहते हैं. धर्म का झंडा उसी ने थाम रखा है. वरना पृथ्वी कब की रसातल में चली गयी होती.भाजपा सरकार में अचानक यज्ञों और धर्म सम्मेलनों की बाढ़ आ गयी थी. इसकी जाँच करवाई जाए तो किसी बोफोर्स घोटाले से कम मामला नहीं निकलेगा).यह चंडाल चर्चा घंटे भर रोज चला करती है. इस चैनल पर. दूसरे चैनलों पर भी एक से एक जटाधारी और कास्ट्यूम ड्रामा में भाग लेने आए प्रतियोगियों जैसे बाबा लोग दिन में कई बार भविष्य बताया करते हैं. अब आप ही तय कीजिये कि टीवी पत्रकारिता कहाँ से कहाँ जा पहुँची है?.....और यह भी कि आगे यह किस रसातल में जा गिरेगी!!
विजय शंकर